न्याय को छटपटाटे संगठन, अघोषित आपातकाल का दंश झेलते आन्दोलन, राजतंत्र मे तब्दील होता, लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। सामाजिक, आर्थिक, समानता के न्याय को लेकर म.प्र. की भूमि से शुरु हुए दो वृहत आन्दोलन भले ही अघोषित आपातकाल का दंश झेलने पर मजबूर हो। मगर सामाजिक न्याय को छटपटाते संगठनों का दर्द यह है कि जो सामाजिक अन्याय, न्याय के नाम राजशाही में तब्दील स्वार्थवत सत्तायें कर रही है। उससे लोगों में आक्रोश व्याप्त है। परिणाम कि 30 सितंबर को भोपाल में आयोजित महा रैली में सत्ता, संसाधनों को दुरुपयोग के बावजूद हजारों लोगों का जुटना और सत्ता के खिलाफ एक सुर में शंखनाद होना इस बात के स्पष्ट संकेत है कि कहीं तो सामाजिक विखराव और असमानता भाव लोगों में घर कर रहा है। वहीं जिस तरह से सामाजिक न्याय के लिए भूमि सुधार को लेकर 4 अक्टूबर से ग्वालियर में सत्याग्रहियों की रैली का धमाकेदार आगाज हुआ है। जिसमें देश भर के विभिन्न राज्यों से लगभग 25000 सत्याग्रही शामिल होने की संभावना है। जैसा कि एकता परिषद के संस्थापक गांधीवादी राजगोपाल पी.व्ही ने कहा है। उन्होंने पत्रकारों के बीच स्पष्ट किया कि सामाजिक न्याय समतामूलक समाज के लिए देश में भूमि सुधार जरुरी है। जिसके तहत एकता परिषद का जन आंदोलन 4 अक्टूबर से शुरु हो रैली के रुप में ग्वालियर से पदयात्रा कर दिल्ली के लिए कूच करेगा।

ज्ञात हो इससे पूर्व भी जिस तरह से पुलिस, सत्ता, संसाधनों के बल पर स्वार्थवत लोगों के इशारे पर लोगों की आशा-आकांक्षा ही नहीं, अध्यापक संघ तथा त्रिस्तरीय पंचायतीराज आन्दोलन को अपनी सहयोगी धन पिपासू तथाकथित मीडिया की मदद से सरेयाम कुचल लोकतंत्र की हत्या हुई। कुछ ऐसा ही लगभग 17 ट्रेने रद्द कर व विभिन्न माध्यमों से दबाव बना, लोकतांत्रिक तरीके से होने वाले सपाक्स आन्दोलन को कुचलने का प्रयास हुआ जिसमें तथाकथित धन पिपासू मीडिया ने सामाजिक न्याय आन्दोलन की अपेक्षा कर स्वार्थवत सत्ता, संसाधनों का भरपूर सहयोग किया, जैसी कि समूचे म.प्र. में आम चर्चा है। 

अगर इसी तरह अघोषित आपातकाल का आभास और छटपटाते आम सामाजिक संगठनो को क्रूर आपातकाल का दंश झेलना पड़ा तो कोई कारण नहीं जो लोगों का विश्वास लोकशाही से टूट, लोकतंत्र में उसे राजशाही का आभास करा दें। जो न तो स्वार्थवत सत्ताओं के हित में होगा, न ही सामाजिक समतामूलक व्यवस्था के और न ही उन राष्ट्रवादी संगठनों के हित में जिनके सामने सरेयाम स्वार्थवत लोग लोकतंत्र को कुचल अपनी महत्वकांक्षाऐं पूर्ण करना चाहते है। 

मगर देखना होगा कि 4 अक्टूबर से पदयात्रा के रुप में ग्वालियर से शुरु होने वाले जन आन्दोलन एवं 30 सितंबर को लोकतांत्रिक तरीके से स्वार्थवत सत्ताओं, संगठनों, संस्थाओं और तथाकथित धन पिपासू मीडिया से लोहा लेने हुंकार भर चुके सपाक्स आन्दोलन के चलते परिणाम क्या होगें फिलहाल यहीं विचारणीय बात आज लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वालों के सामने है।
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