जागरुक नागरिक बना सकते है समृद्ध, खुशहाल, जीवन और राष्ट्र

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है किसी भी व्यवस्था में जब लोग राजनीति तथा अपने अधिकार और कर्तव्यों से अनभिज्ञ होते है और अपने निहित, छणिक, स्वार्थो के चलते अपने नैसर्गिक अधिकार कर्तव्य एवं मूल्य सिद्धान्तों के प्रति जागरुक नहीं रहते, ऐसे समाज, संस्था और लोगों का पतन सुनिश्चित होता है और जीवन कष्टप्रद रह, संघर्षपूर्ण हो जाता हैं। आज जिस तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वार्थवत सत्ता, संगठन, संस्थाओं के अपवित्र अघोषित गठबंधन के चलते स्वच्छंद जीवन में घुठन, फ्रसटेशन का वातावरण निर्मित हुआ है वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है। कहते है सत्य से संघर्ष और सत्य से संग्राम पहाड़ में सिर मारने के अलावा और कुछ नहीं।

जिस तरह से प्रकृति में हवा, पानी के प्रवाह को संपूर्ण रोक पाना असंभव है जो एक संपूर्ण सत्य है। उसी प्रकार किसी विचार, किसी की भावना उसकी आशा-आकांक्षाओं को रोक पाना असंभव है। क्योंकि न तो आज तक कोई सत्य को असत्य साबित कर पाया और न ही पलट पाया और जिसने भी इसे पलटने की असफल कोशिश की उसका आज इस महान भूभाग पर नामों निशान तक नहीं। फिर चाहे वह इतना ही ऐश्वर्यवान, बलशाली, धनशाली, साम्राज्यशाली रहा हो। मगर दुर्भाग्य कि आज कुछ अहम, अहंकारी लोग या उनका समूह सत्य से सग्राम करने उतारु है। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस महान संंविधान में अभिव्यक्ति की आजादी का जो अंश जुड़ा है वह कोई जुमला भर नहीं। बल्कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्था की संजीवनी है। आज इस संजीवनी को नौंच उसे बेजान करने की जो असफल कोशिश हो रही है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, इस व्यवस्था में विश्वास रख अपना जीवन निर्वहन करने वालों के लिए भी घातक है। मगर यह कारवां चल पड़ा है। जिस पर आम नागरिकों का संज्ञान अतिआवश्यक हो जाता है।

अपने छणिक स्वार्थ के लिए अंधे भक्त बन, किसी भी सत्ता, संस्था, संगठन की सेवा उस महान सत्ता, संगठन, संस्थाओं के मूल्य, सिद्धान्तों से धोखा है। जो सर्वकल्याण के लिए होते है और सर्वस्वीकार्य भी और जो लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, नागरिकों की आने वाली पीढ़ी को संरक्षित, सं र्बधित कर उन्हें स्वच्छंद बनाते है। 
मगर आज जिस तरह से लोकतंत्र में राष्ट्र-जन सेवा कल्याण, विकास के नाम अघोषित साम्राज्य स्थापित कर मुठ्ठी भर निहित स्वार्थियों द्वारा संगठित हो, अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए समस्त लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, आम पीडि़त, वंचित, गांव, गरीब, गली की आशा-आकांक्षाओं का दमन, बेमेल लोकतांत्रिक तरीके से हो रहा है वह दर्दनाक भी और शर्मनाक भी। अगर ऐसा ही कुछ वर्ष और चलता रहा तो यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, हमारे महान संविधान ही नहीं, इस संविधान को अंगीकार करने वाले उन भोले-भाले अभावग्रस्त, पीडि़त, वंचितों के साथ अन्याय ही नहीं धोखा होगा। 

जिस तरह से विगत वर्षो में सरकार, नौकरशाह और तथाकथित धन पिपासूू मीडिया द्वारा म.प्र. में अभिव्यक्ति की आजादी का दमन कर अघोषित संगठित गिरोह की तरह अध्यापकों, पंच-सरपंचों और सपाक्स जैसे आंदोलनों को प्रदेश की राजधानी में कुचल समूचे म.प्र. को अनभिज्ञ रखने का अभियान इन स्वार्थवत सत्ता, संगठन, तथाकथित धन पिपासू मीडिया का सफल हुआ है यह लोकतंत्र ही नहीं इस प्रदेश में निवासरत हर नागरिक के साथ धोखा और अन्याय है। उसके लोकतांत्रिक अधिकारों पर सत्ता, धन, बाहुबल के दुरुपयोग का नंगा नाच है। ऐसा नहीं कि इस म.प्र. का नागरिक अपनी जीवन निर्वहन के संघर्ष में इतना मूर्ख और निहित स्वार्थी हो, कि वह इस तरह के आडा बरों के चलते अपने महान जीवन मूल्य, संस्कृति, सिद्धान्तों को तिलांजली दे, समझौता करें। ये सही है कि रोजगार, सृजन का  सत्ता द्वारा अघोषित रुप से किया गया केन्द्रीयकरण और रोजगार, संसाधनों की अनउपलब्धता सहित नोटबंदी, जीएसटी के अस्वीकार्य असंवेदनशील क्रियान्वयन से आम नागरिक बैवस, मजबूर, आभावग्रस्त हो। मगर यह सही नहीं कि उसने अपने जीवन मूल्य और सिद्धान्तों को खो दिया हो। 

जिस तरह से म.प्र. में ठेकेदारी, सप्लाई, छपाई, पेटिंग, मर मत, प्रचार-प्रसार कार्य के बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करने वाले माध्यमों का भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर केन्द्रीकरण हुआ और नौकरियों के नाम अंध भक्तों का नैतिक-अनैतिक तरीके से भला हुआ। उसने आज आम नागरिक ही नहीं व्यवस्था की स्थापित मान्यताओं को तोडक़र रख दिया है। 

इसलिए अब आम नागरिक को निहित स्वार्थ और छणिक लाभ से बाहर निकल यह सोचने की जरुरत है कि जब रोजगार सृजन के अधिकांश संसाधन मुठ्ठी भर लोगों के हाथ हो। सत्ता, नौकरशाही, धन पिपासू तथाकथित मीडिया उनके साथ हो, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के रास्ते साफ हो। ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं अन्याय, अत्याचार के लिए हमारे पूर्वज आक्रान्ताओं से लड़े और अनगिनत कुर्बानियां दी। फिर चाहें वह लाल-बाल,पाल महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, वीर सावरकर, पं.जवाहर लाल नेहरु रहे हो या फिर पीडि़त, वंचितों के कल्याण का भाव रखने वाले लोहिया, पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे महान व्यक्तित्व रहे हो। 

मगर दुर्भाग्य कि हम अपने पूर्वजों की सौंपी विरासत को अक्षुण रखने में असफल, अक्षम साबित हो रहे। जब तक किसी भी व्यवस्था में आम नागरिक अपने निहित स्वार्थ, छणिक लाभ को छोड़ अपनी कौम और राष्ट्र, प्रदेश, महानगर, नगर, गांव, गली, गरीब के बारे में नहीं सोचेगा और राष्ट्र व समाज, परिवार निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर अपने कर्तव्य कृतज्ञता को सार्थक, सफल नहीं करेगा, तब तक स्वार्थवत लोग अपने-अपने निहित स्वार्थो के चलते राष्ट्र जन, समाज, परिवार, कल्याण, सेवा, विकास के नाम पर आशा-आकांक्षाओं को अपने निहित स्वार्थ अहम अहंकार के बूटो तले रौंद हमें नैसर्गिक सुविधाओं अपने अधिकार, कर्तव्य से इतर आभावग्रस्त, संघर्षग्रस्त, पीडि़त, वंचितों की तरह जीवन जीने पर मजबूर करते रहेगें और तब की स्थिति में हमारा स्वयं का जीवन तो कलंकित रहेगा ही, बल्कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी ऐसी कलंकित व्यवस्था, विरासत में छोड़ जायेगें, जो न तो उनके हित में होगी, न ही हमारे महान राष्ट्र, समाज, परिवार और उस महान संस्कृति, सनातन धर्म के हित में होगी जो कभी समृद्ध, खुशहाल हुआ करती थी और जिस पर हम भारत वासियों को गर्व हुआ करता था और आज भी है। 
जय स्वराज 
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