अधकचरी शिक्षा, अधूरे संस्कारों का परिणाम है, आपदा, अव्यवस्था

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। देखा जाए तो व्यवस्था में बड़ी असुरी, संस्कृति, शिक्षा ने अध्यात्म देवीय संस्कारों को धुधला अवश्य किया है। मगर उन्हें खत्म कर दे यह उसकी ताकत नहीं। परम पिता परमात्मा के विधान की आज भी उतनी ही सार्थकता सिद्धता है जिसके लिए महान भारतवर्ष को समुचे जीव-जगत में जाना जाता है। शायद यहीं मंशा हमारे महान संविधान निर्माताओं की भी रही होगी। मगर जिस तरह से उसे परिभाषित कर क्रियान्वयन कर मानव जीव-जगत के जीवन को गढ़ समृद्ध, खुशहाल बनाने का प्रयास हुआ वह अधकचरी शिक्षा अधूरे अध्यात्म से दूर उन अधूरे संस्कारों का परिणाम है कि न तो हम परम पिता परमात्मा के उस विधान को बचा सके न ही उस संविधान को उसकी मंशा अनुरुप क्रियान्वित करा सके जिसके लिए वह अस्तित्व में है। बल्कि हम नैसर्गिक प्राकृतिक संवैधानिक आजादी का लाभ उठा निहित स्वार्थ और सत्ता संघर्ष में इतना डूब गए कि हम परम पिता परमात्मा की बनाई प्रकृति का अंश मात्र भी नहीं गढ़ सके। बल्कि गढ़ी गढ़ाई प्राकृतिक कायनात का नाश कर खुद असुरों की श्रेणी में आ आज अव्यवस्था आपदाओं का शिकार होने लगे।

विज्ञान गढऩा उत्थान समझ अध्ययन का मार्ग है। मगर विलासिता पूर्ण विज्ञान से प्राप्त ज्ञान विनाश की जड़, हमने अधकचरी शिक्षा, अधूरे संस्कारों से आज अपनी महान संस्कृति का नाश कर एक ऐसी विनाशक संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों का मार्ग अख्त्यार कर रखा है। जहां से विनाश, बर्बादी के अलावा मानव जीव जगत को कभी समृद्ध खुशहाली, नैसर्गिक आजादी हासिल नहीं हो सकती और न ही स्वराज की प्राप्ति। क्योंकि सत्य ही स्वराज है।

शान्ति, अहिंसा की परिभाषा के अभाव में इस महान मार्ग को छोड़ जिस संघर्ष के रास्ते पर हम आसुरी शिक्षा, संस्कृति के चलते, समुचे मानव समाज और जाने अनजाने जीव जगत को लेकर चल निकले है वह भी बगैर किसी अपराध के उस मार्ग पर सिर्फ आपदा, अव्यवस्था ही प्राप्त हो सकती है। उस मार्ग पर सिर्फ हिंसा, अशान्ति, अमानवीय जीवन ही नसीब होगा। निश्चित ही लोग आज भौतिक चकाचौंध में इसे पढऩे, प्रतिक्रिया या तिरास्कार की विषय वस्तु समझे मगर सत्य यहीं है।

जिस विज्ञान के अधकचरे ज्ञान और इन्जीनियरिंग अधूरे संस्कारों पर हम फूले नहीं समाते जिस विशेषज्ञता पर हम नाज करते नहीं थकते। उसका परिणाम है कि विनाश के एक से बढक़र एक हथियार तो हमने बना लिए। मगर आज भी हम जीव पैदा करने की तकनीक, न ही न मरने से बच अमर होने की दवा नहीं बना सके, न ही उस प्राकृतिक आपदा का निदान तो दूर हम तो यह भी पता करने का सिस्टम नहीं बना सके कि लोग 100 वर्ष की आयु स्वस्थ्य रुप में कैसे जी सकते है या फिर बारिश, आंधी, तूफान, भूकंप, बाढ़, सैलाब कब कितने आयेगें पता लगा सकते है।

कैसे लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल और आजाद बना उन्हें शिक्षित, सुसुंस्कृत, संस्कार बना पायेगें। आज गांव-गांव, गली, मोहल्ले कलंकित करती इंजीनियरिंग और दहशत पूर्ण अभाव ग्रस्त व्यवस्था इस बात की परिभाषा है कि संविधान, विधान उन्मुख निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन के बजायें हम अहम अहंकार में डूब निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए सत्ता संघर्ष में जुटे रहे है।

बरना इस महान भू-भाग की सृष्टि को संभाले, भगवान श्रीराम भी एक नाम थे और प्रभु कृष्ण भी एक नाम थे। जिन्होंने असुर, दानव, राक्षसों का संहार कर इस सृष्टि को सुन्दर और मानव जीव-जगत के जीवन को सुसंस्कृत, शिक्षित, संस्कारवान, समृद्ध, खुशहाल बना उनका मार्ग प्रस्त किया और लोगों को कर्तव्य का अर्थ और परम पिता परमात्मा के संदेश के अनुरुप जीवन जीकर दिखाया।

निश्चित ही किसी भी व्यवस्था में जनता राजा होती है और यहीं हमारी विरासत, स यता, संस्कृति है। मगर उसकी सेवा सुरक्षा, समृद्धि की रक्षा करना सत्ता, सत्तासीन, राजा, परिषद का धर्म होता है। इसलिये ईश्वर के बाद सत्ता को भी ईश्वर के रुप में माना जाता रहा है। जय स्वराज
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