महान संस्कृति को कलंकित करता, संघर्ष का सैलाब: व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक स्वराज

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। आजकल अधिकार या विरोध को लेकर जिस तरह का दिशाहीन सुनियोजित षडय़ंत्रों से ओत-प्रेात जनसैलाब गांव, गली, मौहल्ला, नगर, शहर की सडक़ों पर दिखता है। उसके लिए स्पष्ट तौर पर वह स्वार्थी शासक और सत्तायें है। जो अपने निहित स्वार्थो के आगे उस महान संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों को दरकिनार कर अपने अनुकूल लोकतंत्र में जन समर्थन चाहती है और ऐन-केन प्राकरेण सत्ता में बने रह, सत्ता सुख उठाना चाहती है। समय-समय पर नेतृत्व आभाव और राष्ट्रीय भावना के कमजोर होते ही जिस तरह से भारत विरोधी ताकतों ने सत्ता समृद्धि के अंधे लोगों की अर्कमण्यता अदूरदर्शता और उनकी अपरिपवक्ता का लाभ उठा। जो जड़े विगत वर्षो में इस राष्ट्र में जमाई है जिनका पौधा रोपण डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही हो चुका था। 

मगर उसके फल प्रतिफल के रुप में आज सडक़ों पर देखने मिल रहे है। भाई-भाई से पड़ोसी-पड़ोसी और एक समाज दूसरे समाज से वेवजह बगैर किसी सोच के लडऩे तैयार दिखते है। जिसके पीछे वह निहित स्वार्थी सोच और वह सत्ता धन पिपासा स्पष्ट तौर पर नजर आती है। जिसके पीछे अन्य ऐश्वर्य धन पिपासूूओं की जमात आम भोले-भाले लोगों को  उस सच से उन्हें बाकिफ ही नहीं होने देना चाहते है। जिससे परिचित होना उनका धर्म ही नहीं, कर्म भी है। 

यहीं दुर्भाग्य इस महान राष्ट्र को आज ऐसे संघर्ष के मुकाम पर ले आया है। जहां पर किसी को सिवायें विनाश, बर्बादी के कुछ भी हासिल होने वाला नहीं। बेहतर हो कि समय रहते हम ऐश्वर्य और धन की अंधी दौड़ को छोड़ मान-सम्मान, स्वाभिमान से जुड़ी अपनी संस्कृति को अपने संस्कारों और समझ के बल पर पुर्न जीवित करें। बरना कहीं ऐसा न हो कि भूभाग न सही वैचाारिक या व्यवहारिक तौर पर हम खण्ड-खण्ड न हो जाये। जो न तो व्यक्ति, परिवार, समाज के हित में होगा और न ही इस महान राष्ट्र के हित में। 

अधकचरे ज्ञान, अधूरी शिक्षा के बल पर स्वयं को विद्यवान समझने वाले लोगों की मंचों पर बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि हम कितनी भयाभय स्थिति में आ पहुंचे है अधूूरे ज्ञान और कुतर्क की पराकाष्ठा के बल पर परिभाषित होती सत्य की परिभाषा किसी भी सभ्य, सुसंस्कृत समाज में इतनी कलूसित हो सकती है। किसी ने शायद ही सपने में सोचा हो। जिस तरह से अज्ञानता और सुनियोजित षडय़ंत्र फैलाने का जो चलन विभिन्न मंचों से चल निकला है वह घातक ही नहीं, इस राष्ट्र के लिए खतरनाक है। फिर वह सत्ता धन पिपासूओं के मंच हो या प्रचार-प्रसार के वह मंच जिनमें टी.व्ही, सोशल मीडिया, समाचार पत्र संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से सुनियोजित षडय़ंत्र के तहत खाने-कमाने को बेबस लगभग 80 फीसदी भोली-भाली आबादी को अपने निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन उत्तरदायित्व निर्वहन के बजाये उन्हें बरगलाया चाहता है। यह इस महान राष्ट्र के लिए शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी। 

जिस सत्य की रक्षा के लिए विभिन्न मतपंतो को समेटे इस महान राष्ट्र व विभिन्न मतपंतो में एक से बढक़र एक मिशालें प्रस्तुत हुई। अनगिनत वेमिशाल कुर्बानियां दी गई। संघर्ष ही नहीं शान्ति, अहिंसा के मार्ग की बड़ी-बड़ी नजीरे प्रस्तुत हुई उस महान राष्ट्र व उस महान भूभाग पर सत्य को धूमिल करने अधूरी अक्षम शिक्षा के अज्ञानियों द्वारा कुतर्क पूर्ण नजीरे प्रस्तुत करना इस महान राष्ट्र और इस महान राष्ट्र के विभिन्न महान समाजों के लिए दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। 

जिस तरह से अज्ञानता, अदूरदर्शिता व निहित स्वार्थो के चलते एक दूसरे की पहचान मिटाने एक दूसरे के मान-स मान, स्वाभिमान को मिटाने का प्रचलन चला तथा शासक सत्तायें अपनी जबावदेही भूल सत्ता व ऐश्वर्य जुटाने में जुटी रही, उसी का परिणाम है कि आज संघर्षरत व्यक्ति, परिवार, समाज सडक़ों पर दिशाहीन संघर्ष करने से चूक रहे। बेहतर हो कि हम अपनी विरासत और स्वयं की वंशावली को पहचाने, एक ऐसे समाज का पुर्न निर्माण की शुरुआत करें। जिसे अक्रान्ताओं द्वारा या इस महान राष्ट्र के दुश्मनों द्वारा सुनियोजित और षडय़ंत्र पूर्ण ढंग से नष्ट-भ्रष्ट एवं पथ भ्रष्ट करने का कार्य सैंकड़ों वर्ष पूर्व किया गया और आज भी वह हमारी कमजोरियों, मजबूरियों का लाभ उठा,  अपने मंसूबे पूर्ण करने से नहीं चूक रहे। यहीं आज सभी राष्ट्र भक्त, मानव, जन कल्याण से जुड़े विद्यवान, समझदार लोगों को समझने वाली बात है और यहीं सत्ताओं को स्वीकार करने वाली बात होनी चाहिए।
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment