सहज, सरल, संवेदनशील ही नहीं, वह विकास व सेवा के बड़े स्वप्न द्रष्टा थे

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। गजब सोच के साथ सपनों को साकार करना उनका स्वभाव ही नहीं उनकी कार्यशैली में सुमार था। सरलता, सहजता, संवेदनशीलता ऐ...

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। गजब सोच के साथ सपनों को साकार करना उनका स्वभाव ही नहीं उनकी कार्यशैली में सुमार था। सरलता, सहजता, संवेदनशीलता ऐसी कि वे एक बड़े राजवंश के इकलौते उत्तराधिकारी और लोकतंत्र में चमत्कारिक नेतृत्व होने के बावजूद उन्होंने कभी आमो खास में कभी कोई फर्क नहीं समझा। छोटे से छोटे आम व्यक्ति के साथ उनका आत्मीय व्यवहार देखते बनता था। चुनौती पूर्ण लक्ष्यों को लेना जनहित से जुड़े बड़े से बड़े अकल्पनीय सपनों को साकार करना उनके स्वभाव में सुमार था। 

आज कै. श्रीमंत माधवराव सिंधिया हमारे बीच भले ही न हो। मगर उनके अविस्मरणीय कार्य और उनकी ऐश्वर्य, गाथा आज हर उस सच्चे नागरिक को सोचने पर मजबूर करती है। वहीं उनकी व्यवहारिक सोच, संवेदनशीलता के वह प्रमाण भी उन्हें याद करने उत्साहित करती है। 

यूं तो पत्रकारिता के शुरुआती दौरे और शिवपुरी में जन्म होने के नाते बतौर क्षेत्र के अभिभावक सांसद केन्द्रीय मंत्री होने के नाते श्रीमंत से कई मर्तबा संपर्क वार्तालाब का मौका मिला। एक मर्तवा जब वह बंबई कोठी रुके तो पत्रकार होने के नाते उनसे जंगल कम होने को लेकर शिकायत थी या सवाल जिस पर उन्होंने ग भीर मुद्रा में कलेक्टर के तलब कर जंगलों की बिगड़ी स्थिति को स्वयं स्वीकारते हुए कहा था कि मैं जब भी हैलीकॉप्टर से देखता हूं तो जंगल पहले की तुलना में काफी कम हो रहे है, ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा ही एक और स्मरण मेरे संज्ञान में है जब वह करसेना में किए गए डकैतों द्वारा सामूहिक जघन्य हत्याकांड के पीडि़तों को ढांढस बंधा शिवपुरी हवाई पट्टी से दिल्ली लौट रहे थे। उस वक्त वह हेलिकॉप्टर की अगली सीट पर बैठ चुके थे। चूंकि कभी-कभी वह स्वयं भी हेलिकॉप्टर चलाते थे। जैसे ही मैंने पत्रकार होने के नाते उनसे चर्चा के लिए आग्रह किया कुछ सोचने के बाद वह बोले चलिए मैं आता हूं और वह हेलिकॉप्टर से उत्तर हेलिपैड के पास बने पंडाल तक आये। जैसे ही मैंने उनसे राष्ट्रीय सवाल किया। उन्होंने जबाव भी दिया और कुशलछेम भी पूछा। साथ ही स्थानीय सवालों का आग्रह किया। क्योंकि शिवपुरी उनके ह्दय में बसता था। आज जब हम उन्हें याद कर रहे है तो ऐेसे में उनके विकास, आम जन राष्ट्र, समाज के लिए किए अकल्पनीय कार्यो की चर्चा लाजमी हो जाती है। 

देखा जाये तो जब वह पहली मर्तवा सांसद बने, तब उन्होंने राजनीति में ऐसे-ऐसे युवा नेतृत्व को मौका दिया जिनके लिए विधानसभा या लोकसभा पहुंचना दिवास्व्पन के समान था। अपने समूचे राजनैतिक जीवन में उन्होंने सिर्फ ग्वालियर-चंबल ही नहीं, मालवा, महाकौशल, वघेलखंड, बुन्देलखंड सहित भोपाल में भी एक से बढक़र एक नेता खड़े किये और स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति की धुरी में स्थापित किया। जहां तक विकास का सवाल है तो जिस ग्वालियर-चंबल के शहर कभी शिक्षा, स्वस्थ, उघोग, रोजगार के लिए मोहताज हुआ करते थे। उन शहरों को उन्होंने इन सेवाओं का हब बनाने का सपना साकार किया। फिर वह सिथोली, मालनपुर, बामौर, विजयपुर रहा हो या फिर ग्वालियर। जिसमें से सिथौली, मालनपुर, विजयपुर, फटिलाईजर जैसे उघोग तो श्रीमंत की ही देन है। वहीं समूचे ग्वालियर-चंबल के छोटे-छोट कस्बों में नवोदय विद्यालय, ग्वालियर में एम.बी.ए नवीन स्वास्थ्य प्र्रशिक्षण केन्द्र तथा लाईफ लाइन की शुरुआत हो। 

उनका सपना था कि ग्वालियर के गोला मंदिर क्षेत्र में 1000 बिस्तर का आधुनिक  अस्पताल बने जिसका भूमि पूजन भी स्वयं के रहते उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी व सोनिया गांधी के हाथों कराया था। ग्वालियर-चंबल के शिवपुरी, गुना की हवाई पट्टी, ग्वालियर हवाई अड्डा सहित जब रेल मंत्री रहे, तो ग्वालियर सहित देश के रेल्वे स्टेशनों का आधुनिकीकरण, शताब्दी ट्रेनों की श्रृंखला व समय पर ट्रेनों का आवागमन ही नहीं। भारतीय रेल्वे को विदेशों में काम दिला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय रेल को याति दिलाई। 

ग्वालियर का अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट हॉकी स्टेडियम, ग्वालियर सहित संभाग भर में रेल्वे, आव्हर ब्रिजों की श्रृंखला आज भी कहती है। जिसमें सबसे बड़ा अकल्पनीय कार्य गुना-इटावा रेल लाईन है। जिसका गुना से शिवपुरी तक का कार्य पूर्ण कराने के साथ ही झांसी, सवाई माधौपुर के बीच रेल लाइन का सर्वे उनकी कृतज्ञता दर्शाती है। चाहे वह शिवपुरी का टाइगर सफारी हो या फिर समूचे ग्वालियर-चंबल में मौजूद पर्यटन होटल उनकी हर दिशा में व्यापक सोच और सहज व्यवहार ही था कि लोग उनकी कृतज्ञता और कर्म निष्ठा को पूरी निष्ठा से याद करते है और असमय उनके जाने को दुखद मानते है। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सहज, सरल, संवेदनशील ही नहीं, वह विकास व सेवा के बड़े स्वप्न द्रष्टा थे
सहज, सरल, संवेदनशील ही नहीं, वह विकास व सेवा के बड़े स्वप्न द्रष्टा थे
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