सैलीब्रिटि सेवा और सियासत से कराहता लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। विगत वर्षो से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जिस तरह से सैलीब्रिटि सेवा और सेवकों प्रभाव बड़ा है उसने बड़े-बड़े सैलीब्रिटि एवं कथा, कहानीकार, फिल्म निर्माता एवं डायरेक्टर, छायाकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। जिस तरह स्क्रिप्ट बोलने व कैमरे के सामने कलाकार गंभीर मुद्रा में नजर आते है और डायरेक्टर के इशारों पर कट कहने पर उसी स्क्रिप्ट को नये सिरे से नये अंदाज में दोहराते है। यहीं आलम आज कल सत्ता ही नहीं सियासी गलियारों में खूब बढ़ चढक़र चल रहा है। 

कहते है तंत्र जो भी हो, मगर सत्ता और सियासत की अपनी विश्वसनीयता और पहचान होती है। किसी भी प्रकार की व्यवस्था चलाने उसके निर्धारित कुछ नियम सिद्धान्त व नैतिकता सहित उनके अपने कुछ मूल्य होते है। मगर मूल्य, सिद्धान्त, नैतिकता विहीन होती, इन सत्ता, सियासतों को शायद नहीं पता कि 70 वर्षो तक फिल्में देख अपने हीरों-हीरोईन के प्रशसंक फिर वह मुफलिस हो या गरीब वह सब समझते है कि असल जिन्दगी और फिल्मी कहानियों में क्या अंतर होता है। कैसे कोई हीरो-हीरोईन नवनिर्मित फिल्म की विवादों के सहारे मार्केटिंग कर मोटा मुनाफा कमाया जाता है। मगर उन जनसेवकों को कौन समझायें कि सियासत और जनसेवा में इन फॉर्मूलों का कोई मूल्य नहीं। क्योंकि व्यक्ति का जीवन कोई कहानी न होकर प्रकृति प्रदत्त वह जीवन है। जिससे उसे स्वयं ही दो-चार होना पड़ता है और ऐसे-ऐसे भीषण तम संघर्षो से गुजरना पड़ता है। जिसकी अनुभूति वह स्वयं ही कर सकता है और कोई दूसरा नहीं। 

इसके बावजूद भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की सैलीब्रिटि सेल्फी या फिर कहानीकार द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट की तरह सीन के अंदर फिट न बैठने पर डायलॉग बदलने की आदत यह किसी भी व्यवस्थागत संवैधानिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं। बल्कि इसके दुष्परिणाम क्या हो सकते है यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। 

अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो जिस तरह से वोट और सत्ता के लिए माई के लाल नाम का शब्द समाज में प्रचारित हुआ और उसके प्रतिरोध स्वरुप जब जनसैलाब सडक़ पर दिखा तब बैठकों का दौर और पुन: अपने डायलॉग में संशोधन इस बात का प्रमाण है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सर्वोच्च संस्थाओं को कैसे लोग संचालित कर रहे है। 

राष्ट्र कोई कथा, कहानी, फिल्म नहीं, बल्कि यह लाखों करोड़ों जीवंत लोगों के जीवन कल्याण से जुड़ा मसला होता है। जहां केवल एक सैलीब्रिटि सेवा नहीं, बल्कि कुर्बानी के दौर से भी उन मूल्य सिद्धान्तों की रक्षा के लिए गुजरना पड़ता है। जिसके लिए वह उस महान संवैधानिक पद पर होते है। जिस तरह फिल्म हिट होने पर कुछ छड़ के लिए प्रशसंकों की सं या किरदार के प्रति बढ़ जाती है। मगर जब फिल्म लॉप होती है तो वहीं प्रशंसकों की सं या ढूंढ़ें नजर नहीं आती है। 

जीवन में असल किरदार और कुर्बानी से दूर वह सैलीब्रिटि कभी न तो सेवक कहला पाते है न ही नेता। असल किरदार और सेवक, नेता तो वह कहलाते है जो अपने राष्ट्र और अपनी कॉम के संरक्षण, संवर्धन, सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगाने तक से नहीं हिचकिचाते है। मगर विकाऊ प्रचार तंत्रों और झूठी स्क्रिप्टों के दौर में कुछ समय के लिए तो सत्ता सुख भोग, ऐसे लेाग हीरो कहला सकते है। मगर उनका इतिहास हो, यह संभव नहीं। यहीं आज सबसे अधिक समझने वाली आम वोट देने वाले नागरिकों के लिए होना चाहिए। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने न तो अब ऐसे संगठन, संस्था नजर आ रही, न ही सत्ता सौपानों में ऐसे लोग जिनसे मूल्य सिद्धान्त आधारित सियासत की उम्मीद की जा सके। संगठनों के नाम मौजूद गिरोहबंद संगठनों या व्यक्तियों के पास जहां अकूत दौलत है। वहीं उनके पीछे अकूत दौलत इकट्टा करने वालों की फौज जो सिर्फ सत्ता हासिल कर, राष्ट्र जनकल्याण से इतर चुनाव जीतने के बाद स्वकल्याण में जुट जाते है और कहीं सेल्फी लेते है तो कहीं मनमाफिक मूल्य सिद्धान्त विहीन बयानों की बौछार बिकाऊ प्रचार तंत्रों के माध्यम से अपने पक्ष में दिखाते है। 
जय स्वराज 

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