वोट कल्याण के आगे दम तोड़ता सर्वकल्याण, सपाक्स आया सडक़ पर

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है जब भी निहित स्वार्थ अहम, अहंकार के चलते न्याय के सिद्धान्त पर कुठाराघात हुआ है। तब-तब अराजकता बड़ी है और उसके परिणाम भी घातक होते रहे है। आज जब एक मर्तबा फिर से इस महान भूभाग पर निहित स्वार्थ, सत्ता या वोट के लिए न्याय के सिद्धान्त पर सत्ता, संगठनों का कुठाराघात हुआ है और सर्व कल्याण से ऊपर, वोट कल्याण को रख गया है। इसीलिए शायद सत्ता ही नहीं, संगठनों के खिलाफ सडक़ पर सरेयाम घेराव, काले झंडे दिखा खुला विरोध हो रहा है। अब इस प्रकार के विरोध के पीछे सत्ताधारी दल, विपक्ष का हाथ बतायें या विपक्ष स्वयं को निर्दोष ठहरायें कारण जो भी हो। जिस नये अत्याचारी कानून के विरोध में विभिन्न वर्ग लामबंद हो, कड़े विरोध की भूमिका में नजर आ रहे। उसके पीछे माननीय न्यायालय की दी गई व्यवस्था के विरोध में एक ऐसे कानून का बन जाना रहा है। जो सर्वकल्याण और न्याय के सिद्धान्त का उलंघन करता है। 

आखिर यह किसी व्यवस्था में कैसे संभव है कि किसी वर्ग को शोषण से बचाने के नाम पर सिर्फ एफ.आई.आर के आधार पर बगैर विवेचना के गिर तार कर लिया जाये। बहरहाल जैसी कि आम चर्चा है कि आरक्षण प्रमोशन तक तो ठीक था मगर जब कोर्ट कचहरी जेल पर आकर मामला पहुंच जाये। तब आप क्या कहेगें यहीं कारण है कि आजकल सडक़ों पर प्रबल विरोध देखने मिल रहा है और वह भी बगैर स्थाई नेतृत्व के अगर चिंगारी यूं ही सुलगती रही और वोट सत्ता की खिचड़ी यूं ही पकती रही। तो शतरंज खेलने वालो को सावधान हो जाना चाहिए कि जो सडक़ पर है वह कोई निर्जीव मोहरे नहीं, जिन्दा इंसान है। अगर चिंगारी आग बनी तो न तो मोहरे बचेगें न शतरंज शेष रहेगी, यहीं आज सत्ता के खिलाडिय़ों को समझने वाली बात है। 

बेहतर हो न्याय के लिए संघर्षरत लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि कहीं वह भी उन घाग राजनीतिज्ञों के मोहरे न बन जाये। जो वोट व सत्ता स्वार्थ के लिए कुछ भी कर गुजरने तैयार रहते है। देखा जाए तो लोकतंत्र में न्याय पाना, न्यायपूर्ण नागरिक का कर्तव्य है। मगर उसे प्राप्त करने अहिंसा से बेहतर और असहयोग से बढिय़ा कोई रास्ता नहीं हो सकता।
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