राष्ट्र-जनसेवा का बड़ा मौका गंवाती, बेमतलब की बहस

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जिस 65 फीसदी युवा देश में रोजगार उन्मुख संसाधनों और प्रतिभाओं के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन सहित उचित शिक्षा उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं सहित आन्तरिक बाह सुरक्षा की अतिआवश्यकता हो। ऐसे देश में छिडऩे वाली बेमतलब की बहसों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। बल्कि इस तरह की बहसे, राष्ट्र जनसेवा का बड़ा नुकसान कर वह मौका गवां देती है और समाज, संस्थायें राष्ट्र को उन संघर्ष के मार्गो पर ले जाती है जिससे अहिंसा व शान्ति का मार्ग कोसो दूर नजर आता है।

जब किसी भी राष्ट्र के लिए संविधान से बढक़र कोई विधान नहीं हो सकता और कानून के राज से बढक़र कोई राज नहीं हो सकता। आज कत्र्तव्य विमुखता के कलंक से कराहते देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष सवाल यहीं होना चाहिए कि देश में संवैधानिक व्यवस्था लोकतंत्र के मान-सम्मान के साथ कानून का राज कैसे कायम हो। बेहतर योजना, नीतियों का निष्ठापूर्ण कैसे क्रियान्वयन हो और लोग कैसे निर्भीक भाव के साथ अपना जीवन खुशहाल और समृद्धि के साथ जी सके।

कलफती मानवता के दुख, दर्द का निराकरण कैसे हो वह कौन से ऐसे मार्ग हो सकते है जिससे यह महान राष्ट्र और इसके भोले-भाले लोग समृद्ध, शक्तिशाली, खुशहाल बन सके। वह कौन-सी नीतियां और न्योक्ता हो जो गरीब, मजलूम, बेबस चेहरों की समृद्धि, खुशहाली लौटा सके।

सत्तायें तो आई और गई भी, फिर आयेगी। मगर इस तरह के संघर्ष पूर्ण बहस चलती रही और जनता जनार्दन कानून के राज के अभाव में कलफ मुफलिसी का जीवन विताती रही तो निश्चित ही समृद्ध शांति, खुशहाली दूर की कोणी साबित होगी। इसलिये राष्ट्र में संविधान से बढक़र किसी विधान और कानून से बढक़र कोई कर्ता नहीं होना चाहिए और यह तभी संभव है जब कर्तव्यों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से हो और बहसों के बजाये व्यवस्था सुधार के प्रयास तेज हो। वरना सैंकड़ों वर्ष बाद राष्ट्र जन सेवा कल्याण का यह बड़ा मौका इसी तरह स्तरहीन बहसो की बली चढ़ जायेगा, जो एक बड़ी भूल ही नहीं, अक्षम्य अपराध भी कहा जायेगा। जिसके लिए दोषी वह निरी भोले-भाले लोग और वह जीव-जगत नहीं स्वयं मानव ठहराया जायेगा।  
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