म.प्र. में भाजपा के चाल-चरित्र को लेकर चर्चाऐं सरगर्म

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। म.प्र. के कार्यकर्ता महाकुंभ में पधारे भारत के प्रधानमंत्री और देश के फायर ब्रांड नेता नरेन्द्र मोदी ने राफेल के बयानी घमासान से इतर जहां दीनदयाल, लोहिया, गांधी में अपनी स्वीकार्यता दर्ज कराई। तो वहीं उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वायपेयी एवं भाजपा की जननी कहीं जाने वाले स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया को याद करते हुए कहा कि राजमाता सिंधिया ने मूल्यों के लिए जेल जाना तो स्वीकार्य किया। मगर कॉग्रेस के आगे झुकना नहीं। ऐसा नहीं कि देश के प्रधानमंत्री ने राजमाता सिंधिया को पहली बार याद किया हो। बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पूर्व शिवपुरी के गांधी पार्क में आयोजित सभा में भी राजमाता सिंधिया को याद करते हुए कहा था कि जब वह एक रैली के दौरान शिवपुरी आये थे। तब एक नेता के रुप में कार्यकर्ता के प्रति राजमाता सिंधिया का स्नेह समर्पण, त्याग उन्होंने एक साधारण कार्यकर्ता के रुप में मेहसूस किया था। इतना हीं नहीं, जब अटेर उपचुनाव में म.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा अपने उदबोधन सिंधिया राजवंश का उल्लेख असंमित बोलो में किया गया। तब भी एक बड़ा बवाल राजमाता के नाम को लेकर हुआ था। तब भी देश के प्रधानमंत्री ने सदन में यह कह कि आजादी से पूर्व सभी राजवंशों का योगदान देश के लिए रहा है। 

मगर पिछले लोकसभा चुनाव से पूर्व जिस तरह से एक कार्यक्रम के दौरान राजमाता की मिट्टी को ही भाजपा के एक नेता द्वारा मरघट की मिट्टी कहा गया। तब मंच पर मौजूद उनकी छोटी बेटी वर्तमान में म.प्र. सरकार की आयरन लेडी, कद्दावर मंत्री यशोधरा राजे सिधिया मंच छोडक़र बीच कार्यक्रम से चली गई। ऐसा ही वाक्या विगत वर्षो सागर में आयोजित एक बैठक के दौरान राजमाता सिंधिया की तस्वीर मंच पर न लगाए जाने के कारण उनकी बेटी को बैठक छोडक़र जाना पड़ा। जैसा कि गत दिनों पूर्व भोपाल में भाजपा की आयोजित बड़ी बैठक में मंच पर राजमाता सिंधिया की तस्वीर न लगाए जाने का लेकर सरेयाम सभा के बीच अपनी नाराजगी म.प्र. सरकार की मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को दर्ज करा, बीच कार्यक्रम को छोडक़र जाना पड़ा। 

इस तरह के सियासी घटनाक्रम और देश के प्रधानमंत्री ही नहीं, भाजपा आलाकमान के ट्विीट 12 अक्टूबर से राजमाता सिंधिया का जन्म शताब्दी वर्ष शुरु हो रहा है। जिनकी स्मृति को बड़े गौरव के साथ भाजपा देश भर में मनाने वाली है। इतना ही नहीं, जिस तरह से राजमाता की छोटी पुत्री और म.प्र. सरकार में मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को सियासी लोग कभी उनकी इन्दौर की ऐतिहासिक इन्वेस्टर सममिट को दरकिनार कर उनका उद्योग विभाग उनसे छुड़ा उनका कद छोटा करने की कोशिश करते है। तो कभी उनके विधानसभा क्षेत्र में प्रशासनिक अड़ंगों की सियासी कर उन्हें जनता के बीच उनका कद छोटा करने की सियासत में लगे रहते है। 

परिणाम कि 10 वर्ष से 29 किलोमीटर दूर से 100 करोड़ रुपये खर्च कर शिवपुरी वासियों को सिंध का शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो सका, न ही शहर के ह्दय स्थल माधव चौक की ऊबड़-खाबड़ सडक़ों का जीर्णोउद्धार हो सका। जबकि म.प्र. में विगत साढ़े चौदह वर्ष से भाजपा की सरकार है। इन सबको लेकर जिस तरह की चर्चाऐं आज समूचे म.प्र. में सरगर्म है और जिस तरह की संदेहपूर्ण घटिया सियासत को लेकर चर्चाऐं चल पड़ी है यह भाजपा आलाकमान ही नहीं, भाजपा के लिए विचारणीय विषय होना चाहिए। चर्चा तो यहां तक है कि जिस राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने जनसंघ से लेकर भाजपा गठन तक तथा डीपी मिश्रा की सरकार के तखता पलट से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी से रायबरैली पहुंच लोहा लेने तक का कार्य अपनी पार्टी के लिए तन-मन, धन के साथ किया हो तथा जिन राजमाता का नाम लेकर देश के प्रधानमंत्री भाजपा आलाकमान गर्व मेहसूस करते हो। उसी भाजपा में राजमाता के नाम या उनकी तस्वीर के साथ इस तरह की सियासत म.प्र. में भाजपा को कहां ले जाकर छोड़ेगी यह तो भाजपा ही जाने। 

सूत्र तो यहां तक बताते है कि अभी हाल ही में किसी बड़े संस्थान का नाम राजमाता सिंधिया के नाम से बदलकर अटल जी के नाम पर किये जाने की सियासत चल रही है। जिसका खुलासा होना अभी बांकी है। देखना होगा कि म.प्र. में राजमाता के नाम को लेकर चल पड़ी सियासत आखिर क्या रंग लाती है। फिलहाल तो भविष्य के गर्भ में है।  
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