सत्ता स्वार्थ के संघर्ष में समाज को झौंकना, राजधर्म नहीं

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। इसे इस महान भूभाग के लिए दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जायेगा कि शान्ति अहिंसा सर्वकल्याण के नाम जाने-जाने वाला यह महान राष्ट्र अपनी प्राकृतिक समृद्ध, संस्कृति सिद्धान्त भुला निहित स्वार्थो में डूब संघर्ष के रास्ते समृद्धि, खुशहाली प्राप्त करने आतुर लगता है। कभी जंबूद्वीप, भरतखण्डे के नाम से चिरपरिचित यह महान भूभाग समुची पृथ्वी पर सबसे सभ्य, सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल माना जाता था। जिसकी विरासत में एक से बढक़र नजीरे जन-जीव कल्याण की समाहित है। फिर हजारों वर्ष की सफल संस्कृति, सिद्धान्तों के बीच ऐसा कुछ वर्षो में क्या हुआ है जो हम निहित या संगठित स्वार्थो के लिए सबकुछ स्वाहा कर देना चाहते है न तो हम अपने विधान को ही अंगीकार कर उस महान संविधान की मंशा अनुरुप व्यवस्था बना पा रहे है और न ही अहिंसा, शान्ति के मूलमंत्र को अपना पा रहे है। 

मगर यहां यक्ष सवाल यह है कि अब राष्ट्र के लिए स्वयं का त्याग, कुर्बानी कौन करे। कौन सत्ता में बैठ या गमछा, तोलिया ले राष्ट्र व समाज सेवा के लिए सडक़ोंं पर निकल पड़े। कौन कुर्बानी दे हर एक समाज व इस महान राष्ट्र को सत्ता में बैठ या समृद्ध, खुशहाल ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीते हुए महान बनाना चाहता है। 

आज न्याय के अभाव में जो चिंगारियां समाज वर्ग, जातियों के निहित स्वार्थ और न्याय को लेकर सुलग रही है। अगर उन्हें सत्ता, संगठनों, संवैधानिक, संस्थाओं में बैठे लोगों द्वारा न्याय के माध्यम से स्वयं के निहित स्वार्थ छोड़ नहीं रोका गया और सडक़ परे संघर्ष के माध्यम से मनचाहा न्याय प्राप्त होता रहा तो यह उस महान स यता, संस्कृति और राष्ट्र के लिए घातक होगा और उस हजारों सैकड़ों वर्ष की उस महान विरासत के लिए भी जिसने हमें कड़ी तपस्या, कुर्बानियों के अनवरत संघर्ष के बाद सभ्य, सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल विरासत दी। घातक होगा उन अनगिनित खूनी संघर्ष के लिए जो हम अहिंसा, शान्ति के दूतों पर थोपा गया। क्योंकि तब हम आक्रान्ताओं के शिकार थे, हम लाचार थे, उन खूनी सत्ताओं और लूटपाट के लिए मशहूर उन शासकों के रहते जो हमारी फूट आपसी संघर्ष का लाभ उठा इस देश के अघोषित-घोषित शासक बन बैठे। 

मगर आज तो हम आजाद है फिर आपस में सडक़ पर संघर्ष क्यों। क्यों हम अपने विधान, संविधान उन्मुख ऐसी न्याय प्रिय व्यवस्था बना पा रहे जो प्रकृति अनुकूल हो सर्वकल्याणकारी हो। निश्चित ही पूर्ववत निहित स्वार्थी सत्तासीनों की गलतियोंं का परिणाम है। सामाजिक स्वच्छंद वातावरण को कट्टरतावादी लोगों की छत्र-छाया से हम नहीं बचा सके। 

मगर अभी भी समय है और सत्ताओं का यह राजधर्म भी कि वह न्याय के लिए बगैर भेदभाव के प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप राजधर्म का पालन करें। अगर सत्ता जाती है तो जाती रहे। जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था सत्ता की परवाह किए बगैर कि सरकारें आयेगीं, जायेगीं। मगर राष्ट्र बचा रहे यह महत्वपूर्ण है। अगर नियत साफ है तो प्रतिफल की प्राप्ति अवश्य होती है। चेहरे बदल सकते है मगर महान सभ्यता, संस्कृति नहीं बदलना चाहिए। यहीं आज सत्ता, संगठन, वर्ग जातियों को समझने वाली बात होना चाहिए। 
जय स्वराज
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