अलाली, घपले-घोटाले भ्रष्टाचार,वसूली में डूबा तंत्र

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध या इनकम टेक्स के छापों में मिलने वाली अकूत दौलत तो मात्र चंद अधिकारी, कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की म.प्र. में नजीर भर है। अगर म.प्र. में मौजूद तथाकथित फार्म हाउस, कृषि भूमि, कोठी व पोश कॉलोनियों से आबाद, मल्टी स्टॉरियों से पटे शहर, नगरों की मालिकाना हक की लिस्टों को खंगाल अगर नाम धारियों से उनके आय के साधन पूछ लिये जाये तो लोक सेवा, जनसेवा, जनकल्याण के रिकार्ड टूटना तय है। 

जैसी कि कई उदाहरण प्रमाणिक तौर पर लोकायुक्त आयकर, आर्थिक अपराध के छापों में चपरासी, बाबू से लेकर अफसरों तक के मामले म.प्र. में आय से अधिक सम्पत्ति या घपले-घोटाले, रंगे हाथों रिश्वत लेते सामने आये। मगर जिस तरह से म.प्र. में ई-टेंडरिंग के माध्यम से निर्माण या सप्लाई क्षेत्र में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो जंग शुरु हुई और उसका जो परिणाम रहा कि आज छोटे-मोटे व्यवसायी, सप्लायर, ठेकेदार या तो इस क्षेत्र से खत्म हो गये या फिर बच्चे पालने अधिकारी, कर्मचारी के रहमों करम पर अपने-अपने व्यवसायिक क्षेत्र में जिन्दा है।रहा सवाल निर्माण क्षेत्र का तो इस क्षेत्र में या तो बड़े पूंजी वाले ठेकेदार जिनका या तो राजनैतिक रसूख है या अकूत दौलत जो अघोषित तौर पर गुपचुप तरीके से इसी मशीनरी के सहारे अपने कार्य निपटाते है या फिर अघोषित, सायलेन्ट पार्टनरशिप दे, पेटी पर काम सौंप जाते है। 

अब ऐसे में जनाकांक्षा, जनसुविधाओं का याल कौन रखे, नव निर्मित उधड़ती सडक़े, टपकती छत और बहते पुल म.प्र. में उसी काबिल इंजीनियरिंग का कमाल है। जो अपने मूल कर्तव्य निर्वहन के बजाये अलाली कर माल काटने में, अवैध भज कलदारम के चलते लगी है। जो यह भी भूल जाती है कि वह जिस जवाबदेही का मोटा वेतन आवास वाहन भत्तों का लाभ आज सेवा या सेवक के नाम उठा रहे है कम से कम उस पद गरिमा का तो याल रखा जाये। हाईबे हो या स्टेट या फिर ग्रामीण सडक़े या महानगर, शहर, कस्बों की सडक़े सभी दूर यहीं आलम है। सडक़ों पर गड्डे या गुणवत्ताहीन निर्माण होने के चलते अप्रत्याशित एक्सीडेंटों में मरते, अपाहिज होते लोगों का आखिर कौन गुनाहगार है। ऊबड़-खाबड़ सडक़ों और सड़ांध मारती बैतरजीह बनी नाली, नालों की तो गिनती ही नहीं, जरा सी बारिश में नहर, नालों में तब्दील सडक़, गली म.प्र. की नायाब इंजीनियरिंग का उदाहरण है। 

बहरहाल मलाई काटती मशीनरी पर सवाल निश्चित ही किसी भी सभ्य सोसायटी में गुनाह कहा जा सकता है और दम तोड़ती जनाकांक्षाओं पर इन्हें  बेवजह का सवाल ठहराया जा सकता है। क्योंकि जब माले मुफ्त हो और जबावदेह लोग बेलगाम तो लोकतंत्र का क्या दोष। सारा दोष तो उस टेक्स अदा करने वालो का ही माना जायेगा जो बगैर सोचे समझे अपना अमूल्य मत का दान कर ऐसे लोगों को चुनते है जिन्होंने लोक ही नहीं तंत्र को भी मजाक बनाकर छोड़ दिया है। अगर ऐसा ही और कुछ वर्षो चला तो न तो लोक के नाम जनाकांक्षायें ही फलीभूत हो पायेगीं, न ही तंत्र अपनी कसौटी पर खरा उतर पायेगा।  

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