बेजुबानों से श्रापित होता भू-भाग, कैसे बने सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कभी गोरस, गौवंश को पूजने वाले लोग तथा पशुधन को अपनी समृद्धि और एश्वर्य का प्रतीक समझने वाला समाज अमृत को त्याग सुरा का सहभागी बन इतना धन पिपाशु हो, उस महापाप का भागीदार बन जायेगा, जिसके सुनने भर से किसी भी सभ्य समाज की रुह कांप जाये। मगर मूड़धन्यों के रहते यह महापाप इस पवित्र महान भूभाग पर हो रहा है। परिणाम कि सडक़ पर पकड़े जाने वाले पशुधन बेजुबानों से ठसाठस भरे वाहन जिन्हें कत्लखाने जाना होता है। 

ऐसी सैकड़ों घटनाऐं हमारे सामने है। यहां तक कि कई मर्तवा तो इस प्रकार प्रकरणों की दुर्दान्त परिस्थिति भी देखने मिली है। इतना ही नहीं अपना घर द्वार, खाना-पानी छिन जाने व पालक विहीन इन बेजुबानों को हाइवे पर पहुंच रोजाना एक्सीडेन्टों में अपनी जान तक गबाना पढ़ रही है। मगर उससे भी शर्मनाक पहलू यह है कि अब तो चन्द रुपयों की खातिर गुपचुप पालक ही इन्हें बेच रहे है।

क्योंकि जो वन विभाग इन पशुधनों के खुरो से जंगलों को खतरा और पौधों को नष्ट होने का कारण मानता है। शायद इन मूड़धन्यों को नहीं पता कि जो जल सरंक्षण का कार्य इस महान भूभाग पर लाखों, करोड़ोंं खुरों के गड्डों से हर बारिश में होता था। जिनकी पेशाब, गोबर से जंगल के पेड़ पौधों को लाखों क्विंटल शुद्ध खाद फ्री में मिलता था। जिससे पेड़-पौधों को जीवन व पशुधन को वर्ष भर का चारा मिलता था। मगर अधकचरी शिक्षा और अधूरे संस्कारों को क्या पता कि  आज बेजुबानों के श्राफ से मानव समाज ही नहीं खेती, किसानी किस भया ाय मुकाम तक जा पहुंची है और अल्प रक्त और कुपाषितों की फौज किस मात्रा में इस महान भूभाग पर बढ़ती जा रही है। अंधाधुंध रासायनिक खादों, पेस्टी साइज दवाओं की मार इस समृद्ध समाज को कहां ले पहुंची है। अमृत के बजाये गांव, गली बिचती शराब ने किस हत  तक सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर, किस विकृति को चौपालों, गलियों में जन्म दें रखा है। उसकी कल्पना भर से भले इंसान का मन सहर जाता है।

आखिर वह पशुधन पूछता होगो उस परमपिता परमात्मा से कि जिस खुर धूली और जिस गोबर का उपयोग पवित्र कार्यो में लिया जाता था। जिन नौनिहालों के मुंह लगते हमारे थनों से दूध उतर आता था। जो सुबह की भोर के साथ दिन-भर खेतों में कड़ी मेहनत के बाद शाम गौधौली के समय इठलाते, बल खाते कुओं, बाबडिय़ों पर पानी पीने जाते थे जिनकों देख हमारा मन गर्व से भर जाता था। आज उनके वहीं लाल थनों से दूध निकलना बंद होने के साथ  ही कहा भेज दिए जाते है। क्यों वो चौपाल, चरनोई के मौजे, तालाब, पोखर उस बुढ़ापे के समय नजर नहीं आते जब वह दूध देना बंद कर जाते है।

कई सवाल इस भूभाग पर पीडि़त उन बेजुबानों के मन में आते होगें। ये अलग बात है कि वह आम मानव की तरह हस बोल नहीं सकते। मगर यह भी सच नहीं कि वह रो उनकी अपनो के वियोग में बिलखती, कलफती आत्मा बददुआ दें, श्राफ न देती हो। मगर मूर्ख, धन पिपाशु, पशु प्रवृति को कौन समझायें उन बेजुबानों के दर्द को। 

मगर जो समझ सोच सकते है उन्हें समझने वाली बात यह होना चाहिए कि आखिर दूध की जगह आज गांव, गली मौहल्लों में शराब क्यों लोकप्रिय हो रही है। क्यों आज गली, चौपाल शराबियों से आवाद बने रहते है। क्यों इस स य, सुसंस्कृत समाज में ऐसे-ऐसे जघन्य अपराध हो रहे है जिनकी कल्पना शायद ही किसी ने सपने में की हो। जिस पशुधन से हमें अनुशासन दया, त्याग और सुसंस्कृत जीवन की सीख मिलती थी जो हमारी महान संस्कृति और संस्कार बने वह कत्र्तव्य, उत्तरदायित्वों का निर्वहन और सर्वकल्याण का भाव बगैर भेदभाव शिकायत किए बगैर हमने कभी इन्हीं से सीखा है। इसलिये मिटते, लुटते बर्बाद होते पशुधन रक्षा ही नहीं उनकी संरक्षण भी होना चाहिए। क्योंकि जिस मानव समाज में जहर से जिन्दगी और सुरा से सुख की अनुभूति होती हो, उस समाज में दूध छाच, मक्खन जीवन मजबूत बना उसे निरोग, समृद्ध व संस्कारवान बनाता है। अगर प्रकृति में पशुधन का बजूद है तो उसकी भी तो कुछ उपयोगिता होगी। कम से कम जो प्रभु कृष्ण में आस्था रखते है और जिस महान भूभाग पर स्वयं प्रभु कृष्ण ने उन वेजुबानों की सेवा कर उनके साथ अठखेलियां की हो। जिनके दूध से निकले मक्खन के लिए वह माखन चोर बने जिस गोबर से प्रतीक बना नाराज राधारानी को उन्होंने हसा दिया। कम से कम ऐसे पूज्यनीय पशुधन की तो इस महान भूभाग पर पूजा नहीं तो उनकी सेवा, संरक्षण या उन्हें स्वच्छंद जीवन जीने का अधिकार तो होना चाहिए। आज भले ही उनका वोट इस लोकतंत्र में न हो, मगर जिन हाथों में वोट की ताकत है उनकी रगों में दौड़ते खून में उनके दूध का अंश तो अवश्य है। इसलिये हमारे समाज में मानव के जीवन की तरह इन बेजुबानों का जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए और उन्हें स्वच्छंद जीवन जीने का अधिकार भी। अगर हम उस महान संस्कृति और प्रभु कृष्ण भागवत गीता को मानने वाले ऐसा कर सके तो यहीं हमारे जीवन की एक बड़ी सफलता सार्थकता और स य समाज की सिद्धता होगी। बरना अंजाने में ही सही इन बेजुबान बहुमूल्य जीव के साथ हो रहे जघन्य अन्याय के श्राफ के चलते हो रहे महापाप के परिणामों की अभी तो शुरुआत भर है जो खबरे आज मीडिया में सनसनी खबरे बन जाती है। उससे भी कहीं अधिक घातक परिणाम इस महान संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों के वंशजों को आने वाले समय में भोगना पड़ें तो कोई अति संयोक्ति न होगी। जय स्वराज


SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment