कर्तव्य विमुख कर्ताओं की कृतज्ञता से कराहता प्रदेश, झूठ, अहम, अहंकार के आगे बेबस लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जिस तरह से आजकल बौद्धिक संपदा के दुरुपयोग का प्रचलन वोट राजनीति के चलते चल निकला है उसका परिणाम है कि लोग एक मर्तवा फिर से यह सोचने पर मजबूर है कि हमारी बौद्धिक संपदा क्यों विदेशों में अपनी प्रतिभा प्रदर्शन हेतु चली जाती है। यूं तो जब भी जिस भी सत्ता, वैचारिक गिरोह, संगठन, संस्थाओं ने संसाधन, सत्ता, बल, अहम, अहंकार चिरस्थाई सत्ता के बसी भूत हो, अपनी ही बौद्धिक प्राकृतिक संपदा, प्रतिभाओं के दमन का रास्ता अख्तयार किया है। उसका न तो आज अस्तित्व ही शेष बचा है न ही नामों निशान रह गया है। जबकि सत्ता शासक, संगठनों का कार्य अपने राज्य के बुद्धिजीवी, प्रतिभाओं को संरक्षण देने और उन्हें संसाधन जुटा स्वछंद वातावरण मुहैया कराने का होता है। मगर जब सत्ता स्वयं अहंम, अहंकार में डूब झूठ के सहारे, संसाधन, धन, बल का उपयोग बौद्धिक, प्राकृतिक संपदा, प्रतिभा दमन में लगा दें तो न तो ऐसे समाज व्यवस्था, सत्ता का भला हो सकता है और न ही उन लोगों का जिनके कल्याण के नाम वह अस्तित्व में होती है। जो राष्ट्र जन सेवा के नाम सत्ता सुख उठाने दूसरों का हक छीनने गिरोह बंद तरीके से लालाहित रहते है।

जिस तरह से कत्र्तव्य विमुख कर्ताओं की मंडली वोट और सत्ता की खातिर भोले-भाले नागरिक ही नहीं अब तो अबोध बाल स्वभाव के सामने ही झूूठे प्रपंच रच स्वयं को महान दिखाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ऐसी सत्ता, व्यवस्था और उन कर्ताओं का भगवान ही मालिक है। 

मगर जिस तरह से स्वराज के वैचारिक कार्य को सत्ता के मद में चूर कर्ता कुचलने की कोशिश में है वह दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। राष्ट्र की प्रतिभा, बौद्धिक संपदा को सजोने के बजाये वह जिस तरह से राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु देश के भविष्यों से खिलवाड़ कर रही है वह एक अक्ष य अपराध ही है। सेवा, संसाधनों का ढिढौरा पीटने वालों को समझने वाली बात यह है कि जो सत्ता 15 वर्षो में उन बौद्धिक लोगों और उन अबोध बच्चों के भविष्य गढऩे के लिए विषय वस्तु ही नहीं बना पाई, न ही वह अच्छे स्कूल, प्रशिक्षित शिक्षक व सर्वसुविधा युक्त विद्यालयों के साथ ही उन मूड़धन्यों को कर्तव्य निर्वहन के प्रति जबावदेह बना पाई। जिनकी कत्र्तव्य विमुखता के चलते समुची व्यवस्था ही बिलखने पर मजबूर है। आज वहीं लोगों की मंडली अपने मूल्य कार्य छोड़ अब स्कूलों में स्वयं के दिग दर्शन के साथ व्याखान देने में जुटे हो। इससे बड़ा व्यवस्था का झूठ और कोई हो नहीं सकता। क्योंकि जिस तरह से कर्तव्य विमुखता के चलते शिक्षा और भविष्य निर्माण के मंदिरों में सेवा भावी आचरण न रहकर वह शिक्षा की दुकाने बन चुके हो। उन्हें सुधारने के बजाये पढ़ाने का स्वांग रचती सत्तायें बजाये सत्तामद से बाहर निकल सेवा के बारे में सोचे। तो शायद वह अपने कर्तव्य और कृतज्ञता को सक्षम, सफल बना सकती है। क्योंकि सत्य सत्य होता है और वहीं स्वराज है। जो यह सोचते है कि उनके अलावा भूतो न भविष्यते तो उन्हें प्रभु राम की रामायाण अवश्य पढऩा चाहिए और लंका विनाश पर अवश्य विचार करना चाहिए। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment