जान की बाजी लगा अपनी व्यथा सुनाने पर मजबूर, बेजुबान

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। नेशनल हाईवे हो या फिर स्टेट हाईवे या कोई सडक़ तेज र तार वाहनों का शिकार होते पशुधनों की मौंतो पर किसी को दु:ख हो या न हो। मगर आये दिन वाहनों से होने वाली भीभत्स मौंतो का महापाप किसके सर हो यह तो शासन ही जाने। मगर जो अंजानापन शासन सरकरों के बीच इन बेजुबानों की मौंतों को लेेकर बना हुआ है। वह बड़ा ही शर्मनाक है। फॉरलेन के रुप में बनी नई-नई चमचमाती सडक़ों पर दिन-रात उमड़ता पशुधन का हुजूम इस बात का गवाह है कि कहीं न कहीं पशुधन की परिसंपत्ति गऊचर पर अतिक्रमण हुआ है। जहां अब न तो उनको खाने चारा है न ही तालाब पोखर शेष रहे। 

जहां उन्हें सहज पेयजल उपलब्ध हो सके। खानाबदोसो की हालत में विचरण करते क्या आवारा क्या पालतू हर तरह का पशुधन खुर की बीमारी से बचने और निर्भीक रुप से भोजन की तलाश में सडक़ों के किनारे विचरण करते है और आराम के समय सडक़ों पर आ जाते है। रात्रि में गुजरने वाला हैवी ट्राफिक के चलते कई पशुओं की आये दिन भीभत्स मौंते हो रही है। कुछ तो कई दिनों तक बीच सडक़ पर ही अपनी अंतेष्टि के इन्तजार में पड़े-पड़े अंतिम गति को तरसते है। तो कुछ का भंडारा उड़ाने मांसाहारी पशु-पक्षी सडक़ पर ही अपनी भूख मिटाना और मृत जीव की मिट्टी को ठिकाने लगाने का काम शुरु कर देते है। 

कारण साफ है जिस तरह से पशुचर भूमि को मुक्तहस्त से शासन द्वारा बांटा गया या राजस्व विभाग की लापरवाही से चरनोई की भूमि को अतिक्रमण किया गया। उससे उनकी चारे की मिलकियत तो जाती ही रही। जैसे-तैसे वह अपना पेट वन विभाग की भूमि में उगने वाले भोजन से भर लेते थे। वन विभाग के व्यवहार के चलते उनका वह स्थान भी छीन लिया गया। मंहगाई के चलते अब पशुधन पालक भी उस स्थिति में नहीं बचे कि वह गैरदुधारु पशु को पाल सके। सो वह भी आवारा घूमने सडक़ों पर छोड़ देते है। वेभाव मरती दुग्धसंपदा का इतना बुरा हाल होगा किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। जो भीभत्स हाल सडक़ों पर आये दिन देखने मिल रहा है। निश्चित ही यह महापाप म.प्र. की महान भूमि पर हो रहा है। जिसका कर्ज आज नहीं तो कल मानवता को अवश्य उठाना पड़ेगा। 

बेहतर हो सरकार अभियान चला इन बेजुबानों की भूमि को मुक्त करा इन्हें अकाल ही मौंत का शिकार होने से बचाये व आम नागरिक भी जागरुकता का परिचय देते हुए दया का भाव दिखा इनके जीवन निर्वहन में सहायता कर अपना अमूल्य योगदान दें और समाजसेवी, संस्थायें भी ज्यादा नहीं तो कम से कम रेडियम जैसी चीजें पशुधन के सींगों या गले में डाल अपनी मानवता का परिचय दे। तभी हम सच्चे और अच्छे मानव और दयावान प्रदेश कहलाऐंगें।
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