दलीय गैंगवार के दंश से कराहता देश सत्ता और शौहरत में डूबा लोकतंत्र, आशा-आकांक्षा रौंधती संगठित सत्ता, संस्कृति

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। गांव, गली के पीडि़त, वंचित अभावग्रस्त लोगों की आशा-आकांक्षा, जनाकांक्षाओं को छोड़ जिस तरह से राष्ट्र, जन कल्याण, सेवा के नाम देश के दलों में आरोप-प्रत्यारोपों का गैंग बार छिड़ा है। उसके चलते देश का वैचारिक आधार भले ही कराहने लगा हो। मगर व्यानों के गैंगवार का दंश झेलते देश में अब तो संस्कार, संस्कृति ही नहीं पर परायें, निश्छल प्रतिभायें भी दम तोडऩे पर मजबूर है।देखा जाए तो गिरोहों का रुप धारण करते दल, संगठन भले ही अपना आधार विचार बताते हो। मगर सत्ता के लिए देश में जिस तरह से गैंगवार छिड़ा है उसे देखकर, सुनकर सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि आशा-आकांक्षायें कहीं सत्ता संघर्ष में स्वार्थवत लोगों के बूटो तले न रौंध दी जाये। क्योंकि आज जिस तरह से अहंम, अहंकार जनाकांक्षाओं पर भारी है वह किसी से छिपा नहीं और जो उम्मीद संवैधानिक संरक्षण प्राप्त लोगों से देश को थी वह भी सत्ता व उनकेे  अघोषित गठजोड़ के आगे दम तोड़ती नजर आती है। 

फिलहाल सत्ता, शौहरत में डूबते लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा, सत्ता के लिए नवउदित संस्कृति से है। साथ ही विधायिका में बैठे लोगों से बनी सरकारों के सत्ता के लिए निर्धारित एजेन्डो के पीछे भागती कार्यपालिका में बैठी वह फौज जो जनकल्याण संवैधानिक भावना को छोड़ सत्ता के एजेन्डे को मूर्त रुप देने में लगी रहती है। जो पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त लोगों के महान लोकतंत्र के लिए खतरनाक भी है और उनकी महान विरासत के लिए शर्मनाक। जिस पर विचार अवश्य होना चाहिए और यह तभी संभव है जब गांव, गली के पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त, संसाधन विहीन लोग अपने क्षणिक स्वार्थ और कभी न पूरी होने वाली महत्वकांक्षाओं को छोड़ स्वयं और इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के बारे में विचार करे। विचार करे इस संकल्प के साथ कि अब ऐसे किसी दल, संगठन का समर्थन आने वाले चुनावों में न करें। 

जो संसाधन विहीन समाज, प्रतिभा तथा मानव जीवन के लिए सत्ता भोगने या सत्ता में बने रहने के बावजूद सीधे उत्तरदायी है और जो चुनाव से पूर्व बड़े-बड़े सपने दिखा अपने बीच के ही लोगों को भडक़ा नाते-रिश्तेदारों से कहलवा बाहुमूल्य वोट चुनाव जीतने के पश्चात सेवक के स्थान पर स्वयं मालिक बन जाते है और रातों-रात हैसियत बढ़ा स्वयं को इस लोकतंत्र का महान व्यक्ति कहलाने टेक्स में प्राप्त जनधन को दोनों हाथों से विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लुटा स्वयं भगवान बन जाते है। 

समय सोचने नहीं कुछ करने का है। इसलिए अपनों के ही बीच से बगैर किसी दल, संगठन के समर्थन के अच्छे और सच्चे व्यक्ति का निर्धारण कर उसे ही वोट दें और उसे ही उन सत्ता सौपानों तक जिताकर पहुंचाये। जिससे पीडि़त, वंचित, अभावग्रस्त लोगों की आवाज उन सत्ता सौपानों में गूंज सके। जहां राज्य व जनकल्याण के लिए नियम, कानून, योजनाऐं बनाई जाती है और क्रियान्वयन करने वाले ऐंजेसियों अधिकारियों से उनका सही लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है। क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे ही वोट से सरकारें बनती है और हमारे ही टैक्स से सरकारें और योजनाऐं चलती है तथा इसी टैक्स से सरकार में बैठे सत्तासीनों व कार्यपालिका में बैठे अधिकारी, कर्मचारियों को सुख सुविधा गाड़ी घोड़े, मकान और वेतन की व्यवस्था होती है।  
जय स्वराज 

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