स्वार्थवत सोच, सत्ताओं से कराहता स्वराज

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जिस झूठ, अहंकार, झूठे आंकड़ों के सहारे जनधन के बल स्वार्थवत सोच, सत्तायें स्वराज का सपना देख रही है, वह कभी पूर्ण होने वाला नहीं। कारण साफ है जिस स्वार्थवत सोच और सत्ता के लिए आज विद्या, विद्ववानों को अपमानित कर प्रतिभा दमन का अभियान चल रहा है। वह दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी है। ऐसी सोच, सत्ताओं को समझने वाली बात यह है कि आज तक इस सृष्टि में न तो कोई सत्य को पलट पाया न ही प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक गुणों और प्राकृतिक  सिद्धान्तों में स्वीकार्य बदलाव ला पाया। मगर इसके उलट सेवा कल्याण के नाम जिस तरह से जनता से टेक्स में मिले नोट और मतदान में मिले वोट के सहारे स्वयं की छवि चमका सौंगातें बांटने का जो दौर चल निकला है। उसे देख अब तो राजावली का भी त्याग आज के सत्ता लोलुप भ्रामक प्रचार के आगे बौना नजर आने लगा है।

मगर यहां गांव, गली राष्ट्र में निवासरत हर उस नागरिक को समझने वाली बात यह है। कि जो जनसेवक, लोकसेवक, जनधन से टेक्स के रुप में प्राप्त धन से, जनसेवा, विकास, कल्याणकारी नीतियां बनाने व उन्हें क्रियान्वित करनेे  स्वयं के लिए वेतन, भत्ते, मकान, कार, हवाईजहाज, हेलिकॉप्टरों की सुविधा लेते हो और उसी जनधन से विकास कल्याण जनसेवा सेवा के नाम अपनी-अपनी छवि, जन-धन से चमका, आये दिन करोड़ों की सौंगाते बांटने की बातें प्रचार-प्रसार के माध्यम से करते हो। इससे साफ हो जाता है कि ऐसे जन व लोकसेवक अपनी जबावदेही और कर्तव्य निष्ठा के प्रति कितने समर्पित है। 

मगर दुर्र्भाग्य कि हमारे लोकतंत्र में विगत 25 वर्षो से यह खेल जनसेवा कल्याण के नाम खुलेआम चल रहा है। क्योंकि तीन पीढिय़ों से हम इसलिये चुप है कि हमारे द्वारा चुनी गई। सत्ताऐं व सरकारें हमारी न सही, कम से कम हमारी आने वाली पीढ़ी पर दया रहम कर उनके भविष्य को अवश्य बेहतर बनाने में अपना योगदान देंगीं। क्योंकि लोकतंत्र को अंगीकार करने वाले हम गांव, गली, गरीब को भले ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने मत के माध्यम से अपना भविष्य सवारने वाली सत्ताओं और सरकारों को चुनने का अधिकार अवश्य है। मगर दलों के नाम तथाकथित गोलबंद गिरोहों के आगे हमारी भावनायें, जनाकाक्षायें बेवस, मजबूर है। जो हमारे लिए सुखद और सार्थक नहीं कही जा सकती। जबकि हमारे महान संविधान की आत्मा जिसें हमने अपने महान विधानों से इतर सर्वोच्च मान स्वीकार्य किया है। उसके अनुरुप न तो हमारी सत्तायेंं, सरकारें ऐसे गोलबंद गिरोहों का कुछ कर पा रही है, न ही उनसे अछूती रह पा रही है। 

हमने तो सोचा था कि ये गांव, गली, राज्य व राष्ट्र में हमारा राज होगा हमारा मान-स मान बढ़ेगा और हमारी महान विरासत पहचान स्वाभिमान सुरक्षित रहेगा। जिसकी गोद में हम ही न हीं हमारी आनें वाली नस्लें और हमारी महान प्रतिभायें, विधा, विद्ववान स्वच्छंद वातावरण में अठखेलियां कर अपने जीवन को सार्थक सफल, समृद्ध, खुशहाल बना सकेगीं। मगर सोई व स्वयं में डूबी हमारी युवा पीढ़ी व अपनी मजबूरियों और बेबसी के चलते कर्तव्यों विमुख हमारी पीढ़ी समुचे संसाधनों व नैसर्गिक सुविधा के आभाव में बहुत कुछ नहीं कर सकी। जो किसी भी समृद्ध, सुसंस्कृत, सभ्य समाज को उस समाज के व्यक्तियों से अपेक्षित होता है। 
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