स्वयं स्वार्थों से निकल, युवाओं को खुद संभालना होगी, चुनाव और सत्ता की कमान

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: स्वराज के लिए संकल्पित और देश की आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रहे महात्मा गांधी के शैक्षणिक सहयोगी शिक्षाविद बाल गंगाधर तिलक से लेकर शहीद भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद का मानना था कि उनका सर्वोत्तम बलिदान उस आजादी के लिए हो। जिसमें 2-5 लाख अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजी मानसिकता व आचरण व्यवहार वाले चंद ऐसे लोग देश की सत्ता संचालन के मुखिया न बन जाये। जिससे देश के गरीब आभावग्रस्त पीडिृत, वंचित लोगों का जीवन अपनो के ही बीच कष्ट पूर्ण संघर्षपूर्ण न बन जाये। बल्कि उनकी मंशा थी कि देश में ऐसा स्वराज स्थापित हो, जिसमें देश के गांव, गली, नगर, शहर का हर पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त नागरिक स्वयं का राज महसूस कर, स्वयं के जीवन को समृद्ध, खुशहाल बनाने में सक्षम हो। मगर दुर्भाग्य कि देश के लिए बेशकीमती कुर्बानी देने वालों के देश में आजादी के पश्चात संवैधानिक तौर पर चुनावों में लाखों-करोड़ों रुपए के चुनावी खर्च की सीमा एवं दलों, संस्थाओं, संगठनों के रुप में विचार, विचारधारा के नाम मौजूद तथाकथित गोलबंद गिरोहों की सक्रियता, संपन्नता, सक्षमता ने साफ कर दिया कि जिस आजादी के लिए भारत में जिन पीडि़त, वंचित अभावग्रस्त गांव, गली, गरीबों की अनगिनत कुर्बानियों हुई उनका आजाद भारत की सत्ता में पहुंचने में अब उनका कोई वजूद नहीं रहा। 

अब अगर देश के गांव, गली, नगर, शहर के पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त गरीब, किसान, शिक्षक को सत्ता के महलों, मंदिरों तक पहुंचना है तो उसे संविधान की भावना के विरुद्ध जाकर गोलबंद गिरोहों के तथाकथित दलों के रहमों कर्म पर चुनाव लडऩा होगा या फिर अकेले ही लाखों-करोड़ों खर्च कर, संविधान की शपथ लें, ताकतवर पदों पर आसीन लोगों से संघर्ष कर चुनाव जीतना होगा।

अब ऐसे में समझने वाली बात यह है कि ऐसे तथाकथित गिरोहों बंद दलों के रहते गांव, गली, नगर, शहर के गरीब, पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्त, स्वाभिमानी लोग मानव के रुप में शर्कस की तरह कर्तव्य व रिंग मास्टर के चाबुक के इसारे पर खेल दिखाने वाले लोग या फिर लाखों-करोंड़ों स्वयं खर्च कर चुनाव जीतकर आने वाले लोग कहां से आएंगे। ऐसे में जरुरी हो जाता है किसी भी राष्ट्र व राज्य के नागरिक युवाओं को जो स्वयं के सपने साकार करने की असफल अंधी दौड़ में यह भूल जाते है कि उनका वर्तमान तो कष्टप्रद व नैसर्गिक सुविधायें शुद्ध पेयजल, स्वास्थ्य सेवायें, सर्वकल्याणकारी शिक्षा, सहज रोजगार से वंचित है ही और भविष्य भी अंधकारमय। ऐसे में उन्हें स्वयं व स्वयं के परिवार और सपनों से बाहर निकल हकीकत या यथार्थ के धरातल पर संकल्प लें, एक नई शुरुआत संविधान की मंशा अनुसार करना चाहिए। जिससे वह इन गिरोहबंद तथाकथित दलों की चापलूसी, चाटूकारिता और शोषण युक्त नीतियों तथा समाज से उपेक्षित नेताओं की जिन्दाबाद करने के बजाये अपने ही बीच से एक ऐसा सच्चा और अच्छा जनप्रतिनिधि सर्वस मति से स्वयं के वोट और 10 रुपये के नोट के सहयोग के बल पर चुन, अपने सपने साकार व स्वयं के जीवन सहित परिवार, समाज और राष्ट्र को समृद्ध, खुशहाल बना सके। क्योंकि सच सभी के सामने है जो सेवा कल्याण का नारा बुलंद कर, अकूत संपदा के अघोषित मालिक व सत्ता में अपना जन्म सिद्ध अधिकार बना चुके है। उन्होंने यह हैसियत इस लोकतंत्र में किसी गांव, गली के गरीब, मजदूर की तरह मजदूरी कर या गड्डा खोद या फिर किसी खेत में भीषण गर्मी, बरसात तथा कड़ाके की ठंड में हल चलाकर  नहीं बनाई बल्कि जन सहयोग के चंदे और झूठ सच बोल हासिल हम भोले-भाले लोगों से वोट हासिल कर, सत्ता तक पहुंच बना खुद की समृद्धि बनाई है।

अब यहां यक्ष सवाल यह हैं कि जब सरेआम जनधन के बल पर तथाकथित गिरोंह बंद दल अपने व अपने सत्तासीनों की छवि चमका सत्ता का मार्ग प्रस्त करने अघोषित रूप से सारी लोकतांत्रिक मर्यादाएं लांग लोकतंत्र को ठेगा दिखा रहे है और विपक्ष के नाम स्वयं के मुंह में सत्ता का रसगुल्ला आता देख सत्ता का मुगालता पाले है जिनके मुंह से न तो गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचित, आभावग्रस्तों की आह फूट रही है और न ही उनकी असहनीय पीड़ा दिख रही है। ऐसे में अच्छे और सच्चे लोकतंत्र की रक्षा तथा स्वयं व अपने परिवार सहित समाज, राज्य, राष्ट्र की समृद्धि, खुशहाली और सुनहरे वर्तमान भविष्य की शुरुआत उन चेतन्य युवाओं को, अपने बुजुर्गो के मार्गदर्शन आर्शीवाद से ऐसे विधा विद्ववान के मार्गदर्शन में करनी होगी जिन्हें राष्ट्र जन व सर्वकल्याण सर्वोपरि है। रक्षा करनी होगी उन्हें अपने कत्र्तव्य निर्वहन से जो वर्षो से दल, सत्ता, संगठन, संस्था में त्याग, तपस्या कर, आज भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संघर्षरत है और अपनी नस्लों का वर्तमान भविष्य बेहतर चाहते है। क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा ही वह अमूल्य वोट और धन है जिसे चंद स्वार्थी हासिल कर, सत्ता तक सेवा कल्याण के नाम पहुंच स्वयं व स्वयं के लोगों के कल्याण में जुट जाते है। आज के समय में हर बच्चे, युवा, बुजुर्ग को यहीं समझने वाली बात है। जय स्वराज
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