बारिश ने की तकनीक और विकास की समीक्षा, विकास वीरों को ललकारता सडक़ पर सैलाब

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है मंत्रमुग्ध तकनीक विकास कितने ही सुधरण सुविधा युक्त विकास की डीगे क्यों न हाके। मगर सच यह है कि हकीकत से दूर जरा-सी बारिश में सडक़ों पर उफनता सैलाब गांव,गली में जल भराव हमारी योग्यतम तकनीक, इन्जीनियरिंग युक्त विकास की बखिया उधेडऩे काफी है और उन मूड़धन्य माननीयों की आंखे खोलने काफी है। जो सत्ता के मद चूर आज भी बेबस जनता भोले-भाले लोग, गांव, गली की जनभावनाओं का लाभ उठा, सत्ता सुख के आगे यह स्वीकारने तैयार नहीं कि लोग ऐसे अन्धे विकास और स्वार्थवत सत्ताओं के व्यवहार से परेशान ही नहीं, हलाकान है। 

देखा जाए तो जिस विनाशक तकनीक का प्राकृतिक सिद्धान्तों के विरुद्ध धुंआधार किया जा रहा है। अगर इसी तरह ऐसी तकनीक का उपयोग प्राकृतिक के विरुद्ध होता रहा, तो अभी तो शहरों की सडक़ों पर जल भराव और जल सैलाब से नजारे देखे जा रहे है। कहीं इससे भी बत्तर स्थिति हो तो कोई अति संयाक्ति न होगी। 

काश हमारे सत्तासीन कुछ घंटे ही सत्ता के मद से बाहर निकल गरीब जनता एवं विकास शुल्क चुकाने वाले सब्रान्हत नागरिकों के बारे में कुछ सोच पाते तो आज यह दिन नहीं देखना होता और न ही इस तरह के अंधाधुंध विकास पर खर्च होने वाले करोड़ों, अरबों रुपयों से जनता को हाथ नहीं धोना पड़ता। मगर लगता नहीं कि हमारे मूड़धन्य सत्तासीन अभी भी स्कूल, अस्पताल, मुख्य मार्ग, बस्तियों, गलियों को जरा-सी बारिश में जलमग्न होने से बचाने के लिए सोचने वाले है। जो किसी समाज, सत्ता और उस तकनीक को क्रियान्वियत करने वाले लोगों के लिए बड़े ही दुख और शर्म की बात होना चाहिए जो 21वीं सदी में जीने का दम भरते है।  

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