सेवा के साथ समाज, सर्वकल्याण के भाव से स्वयं को अछूता नहीं रख सके: आर.एन सिंह

5 फरवरी सन 1958 को उ.प्र. के आगरा जनपद के गांव राजपुरा मेंं, श्रीमती प्रमिला देवी के घर जन्में आर.एन सिंह के पिता श्री हेत सिंह की वह चौथी सन्तान है। पिता हेत सिंह ने खेतीबाड़ी कर अपने छ: बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा दी। जिनमें उनकी 2 पुत्री और 4 पुत्र शामिल थे। मगर पढ़ाई-लिखाई मेंं अपने चौथे नंबर के पुत्र आर.एन.सिंह का गेरा रुझान देखते हुए उन्होंने उन्हें प्राथमिक शिक्षा गांव राजपुरा, हाईस्कूल सैंया व इंटरमीटियट की शिक्षा आगरा के सेंट चाल्स स्कूल से उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्हें उच्च शिक्षा के लिए रायपुर भेज दिया। जहां उन्होंने प. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ इन्जीनियरिंग बी.ई. की शिक्षा गोल्ड मेडल के साथ प्राप्त की तथा सन 1981 में एन.आई.टी. में सन 1981-82 तक अस्सिटेंट प्रोफेसर की नौकरी की। तथ्यपश्चात आपने म.प्र.लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी। जिसमें उन्होंने पूरे म.प्र. में प्रथम स्थान प्राप्त कर म.प्र. शासन के जल संसाधन विभाग में सहायक यंत्री के पद पर नियुक्ति प्राप्त की और जल संसाधन में ही लंबी सेवाकाल के पश्चात 2018 में कार्यपालन यंत्री पद से वह निवर्तमान हुए।

चूंकि उन्हें शुरु से ही सेवा, समाज और सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े जनकल्याणकारी कार्यो में गहरी आस्था और रुचि थी। जो उन्होंने अपने सेवा काल के दौरान भी अनवरत जारी रखी। हर्षी, मड़ीखेड़ा , महुअर, समोहा जैसी वृहत सिंचाई परियोजनाओं के औपचारिक, अनौपचारिक साक्षी रहे। आर.एन. सिंह ने वृहत तालाब व जल ग्रहण मिशनों के माध्यम से जल सहजने और लोगों के अंदर जागरुकता बढ़ानें में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई। जिसके चलते पानी बचाओ, तालाब बचाओं जलावर्धन, सीवर प्रोजक्ट जैसे मिशनों में भी आपने-अपने तकनीकी कौशल से निस्वार्थ भाव से अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

ये अलग बात है कि वह शासकीय सेवा में रहते जहां अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति हमेशा सजग रहे, तो वहीं दूसरी ओर उन्होंने सामाजिक सरोकारों की सार्थकता से सिद्ध करने समय-समय पर अपनी सहभागिता कर, कई विषयों पर अपनी माहती भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, उन्होंने सामाजिक उत्थान की गरज से अपने परिजनों को अपने मार्गदर्शन में डेयरी उघोग के प्रति उत्साहित कर, उनके आर्थिक उत्थान को नई दिशा दें, समाज में मौजूद शराब जैसी सामाजिक बुराई से भी समाज की रक्षा हेतु तथा समाज के अन्दर शिक्षा का संचार कर, उसे शिक्षित सुसंस्कृत बनाने की ललक से सामाजिक गतिविधियों में अपनी सक्रियता बढ़ाई। परिणाम कि आज एक नि:शुल्क आवासीय सामाजिक विद्यालय संचालित है तथा शराब जैसी बुराई से एक बड़ा वर्ग आज तोबा कर चुका है। 

इस बीच सिंह के जीवन में सेवा व स्वयं के स्वास्थ्य को लेकर भी समुची सेवाकाल के दौरान भीषण संघर्ष रहा। मगर उन्होंने बगैर किसी की परवाह किये बगैर, कभी न तो अपने कदमों को रुकने दिया न ही और न ही थकने दिया और न ही बड़ी से बड़ी बाधाओं को अपने लक्ष्योंं पर कभी हावी होने दिया। 

आज जब वह निवर्तमान होने एवं ज्यादातर समय अस्वस्थ रहने के बावजूद भी जन हित से जुड़े सार्वजनिक कार्यो में अपनी सहभागिता को सीमित नहीं रखते। ऐसे में उनके जीवट-जीवन की संघर्ष पूर्ण गाथा स्वत: ही बखान करती नजर आती है, जो लोगों को सीखने योग्य होना चाहिए।
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