बौद्धिक भामाशाहों से कहराता प्रदेश, कुर्तक की बजाए, कृतज्ञता की होती, तो न कराहता प्रदेश

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। म.प्र. शिवपुरी। जिस तरह से सत्ता या सत्ता में बैठे लोग, दल पीढ़ाओं से भरी खबरों की काट-छांट करने की अक्षम, असफल कोशिश भाड़े या वैचारिक बौद्धिक कुर्तकियों के सहारे करने के बजाए, अपनी कृतज्ञता की होती और पूर्ण निष्टा ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर, अपनी जवाबदेही पूर्ण की होती तो आज जब चुनावी बयार चलने को है। ऐसे में उन्हें इन भाड़े के या वैचारिक बुद्धिजीवियों के कुर्तकों के रणकौशल का सहारा न लेना पड़ता। जिस तरह से प्रदेश में सहज संसाधनों के अभाव में प्रदेश की प्रतिभाऐं, पढ़े-लिखे व लाखों रुपये खर्च कर कौशल प्राप्त करने वाले लोग शिक्षित कुशल होने के बावजूद दरदर की ठोकरे खाने पर मजबूर न होते और न ही प्रदेश की दिव्य-भव्य चमत्कारिक प्रतिभाऐं शिक्षा के नाम खुली दुकानों पर रट्टू तोता बन ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं का उपयोग करने में असर्मथ न होती। यह शान्ति के टापू व प्रकृति के अकूत भंडार से भरपूर उस महान प्रदेश ही नहीं सत्ता, सत्तासीन व मार्गदर्शकों के लिए दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक बात होना चाहिए। 

कहते है कि गरीब पीडि़त, वंचित अभावग्रस्त गांव,गली का पेट अगर बातों के बताशों और झूठे प्रचार-प्रसार से भर रहा होता तो लोग सडक़ों पर अपना हक पाने नैसॢगक सुविधाऐं हासिल करने अपनी बहुमूल्य जान की बाजी लगा कभी उस सत्ता के खिलाफ संघर्षरत न होते, जिसे वह अपना अमूल्य वोट देकर हर पांच वर्ष में चुनते आ रहे है। 

सत्ताओं व सत्ता में बैठे लोगों के लिए समझने वाली बात यह है कि अगर उन्होंने अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ कर अगर  आम नागरिकों की आशा आकांक्षा के अनुरुप एक समृद्ध प्रदेश बनाने के लिए अपनी जबावदेही उत्तरदायित्व को साक्षी मान, निर्वहन किया होता। तो आज प्रदेश के अधिसं यक लोग निर्धारित मानक के नीचे का अशुद्ध पेयजल ग्रहण कर गंभीर बीमारियों का शिकार नहीं हो रहे होते। अगर सत्ता व सत्तासीनों ने झूठे प्रसार-प्रचार के माध्यम व कुतर्क से परिपूर्ण बुद्धिजीवियों की मंडली को संरक्षण दें, उन्हें सक्षम बनाने के बजाए अगर अल्प रक्त की बीमारी से पीडि़त माता-बहिनों, बच्चों को पोषित करने पर्याप्त धन व स्वास्थ्य सेवाऐं उपलब्ध कराई होती, तो कुपोषण से मरने वालों का कलंक और कुपोषण जैसी महामारी से हमारे नौनिहालों को घसीटती जिन्दगी को न जीना पड़ता। 

अघोषित केन्द्रीयकृत रोजगार, व्यापार, ठेकेदारी जैसे संसाधनों को भ्रष्टाचार से मुक्ति के नाम अगर संरक्षण न दिया होता और प्रदेश के सामने सत्य रख प्रतिभाओं को खुले दिल से संरक्षण दिया होता तो आज प्रदेश में समृद्धि खुशहाली, रोजगार के आयाम कुछ और ही होते। प्रदेश में संसाधनों का आभाव ही वह कलंक है जिससे सत्ता या सत्ता में बैठे लोगों को मुक्त होना अब असंभव ही नहीं, उनकी सबसे बड़ी अक्षमता, असफलता का प्रमाण है फिर दलील जो भी हो। मगर प्रदेश तो कलंकित हुआ ही है। जिसका न तो कभी वर्तमान खराब है और न ही भविष्य खराब है।

बेहतर हो कि भाई भतीजा बाद, वैचारिक अवशाद से निकल प्रदेश के बारे में सच्चे दिल से सोचा जाए तो इस प्रदेश को सोने की चिडिय़ा बनने से कोई नहीं रोक सकता। तब सत्ता और सत्ता में बैठे या विपक्ष की भूमिका निभाने वालों पर प्रदेश की समृद्धि, खुशहाली का मार्ग भी होगा और लक्ष्य भी जिसे प्राप्त करना कोई असंभव कार्य नहीं। क्योंकि हमारे प्रदेश में प्रतिभा भी है और प्रचुर मात्रा में संसाधन भी। जरुरत सिर्फ पुरुषार्थ की है। सबकुछ संभव है। जय स्वराज
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