बेबस तकनीक, विज्ञान को मुंह चिढ़ाता विकास, प्रकृति के कहर से अंजान अहंकार, तबाही को तैयार

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। प्रकृति व महामानवों ने सृष्टि में समस्त जीव-जगत तथा मानव के सृजन कल्याण समृद्धि का सपना देखते वक्त व उस मानव को अपने गर्भ से, अपनी  सर्वोत्तम कृति मान गढ़ते वक्त सपने में भी न सोचा होगा कि वह जिस मानव को अपनी संपूर्ण सर्वोत्तम कृति मान सृजन कल्याण के लिए संरक्षित कर समर्वधित कर रहे है। कभी उसी मानव के अहंकार के चलते उसकी यह सुन्दर कृति और सृष्टि के विनाश का कारण बनेगी। 

उसे क्या पता था कि वह मानव के रुप में अपनी जिस सर्वोत्तम कृति को  स्वयं व समस्त जीव जगत नव, जल, थल, चर के संवर्धन संरक्षण के जबावदेही सौंपी है। एक दिन वहीं मानव अपने निहित स्वार्थ बस सर्वकल्याण को दरकिनार कर तथा अपने नैसर्गिक उत्तरदायित्व को भूल, अपने अहम, अहंकार में डूब, स्वयं ही सृष्टि, सृजन कल्याण में सबसे बड़ी बाधा साबित होगा। 

उसे तो शायद उस वक्त ये भी एहसास न रहा होगा कि जिस आध्यात्म, ज्ञान, संस्कृति, संस्कारों के साथ सृष्टि में मौजूद सर्वोत्तम शिक्षा का ककहरा समझा। जिसे सृजन के लिए रख छोंड़ा है एक दिन वहीं मानव स्वार्थवत सत्ताओं द्वारा परोसे जाने वाली विलासिता पूर्ण शिक्षा, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, तकनीक को अंगीकार कर निहित स्वार्थ, अहंकार में स्वयं के मूल कर्तव्य, उत्तरदायित्व भूल जबावदेही से विमुख अहम, अहंकार और निहित स्वार्थो में डूब जायेगा। 

परिणाम कि कभी अब वर्षा तो कभी भीषण गर्मी कहीं तूफान तो कहीं जल कीचड़ के सैलाब आ रहे है। जिसे देख जीव-जगत तो चकित है ही। मगर अब तो मानवता भी कांपने लगी है। देखा जायें तो आज जितनी बड़ी कीमत इस विनाश की समस्त जीव-जगत व वैवस मानवता को चुकानी पड़ रही है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है। कि बढ़ते प्रकृति प्रकोप के आगे समस्त ज्ञान-विज्ञान धरासायी नजर आता है और मौजूद महामानवों की मण्डली असहाय।

मगर जिस रोद्र रुप मेें प्रकृति का ताडंव विभिन्न रुपों में हो रहा है। उससे संदेश स्पष्ट है कि अगर अभी भी समय रहते हम अहम, अहंकार निहित स्वार्थ छोड़ अपने मूल मार्ग कर्तव्य, उत्तरदायित्व, जबावदेहियों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से कर, अपनी महान शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों पर नहीं लौटे तो फिर हमें भविष्य में इससे भी बड़े खतरनाक सैलाब व तबाही के लिये तैयार रहना चाहिए। 
जय स्वराज 
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