म.प्र. कॉग्रेस-जीत से पहले, हार की रिहर्सल, रीवा-छतरपुर बने नजीर

वीरेन्द्र शर्मा: आचरण के अभाव में अनुशासन हीनता किसी भी संगठन में होना कोई नई बात नहीं। मगर स्वयं के सेवादल को भूल, RSS के मुरीद नेताओं को सोचना चाहिए कि सेवादल समाज में सिर्फ सेवा भावी कार्य ही नहीं करता था। बल्कि नेताओं को सुरक्षा और कार्यक्रमों में अनुशासित बेहतर व्यवस्था का भी उत्तरदायित्व निभाने का कार्य उसके द्वारा पूरी निष्ठा के साथ किया जाता था। कभी जिसका नेतृत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कर सेवा दल को समुचे देश में एक नई पहचान और ऊंचाई देने का कार्य किया।

मगर स्व. राजीव गांधी के बाद जिस तरह की दुर्गति इस संगठन की हुई वह शायद ही किसी से छिपी हो। काश कांग्रेस नेता आरएसएस के मुरीद होने के बजाये स्वयं के अनुवांशिक संगठन की दशा सुधार उसे सही दिशा दी होती तो 14 वर्ष से म.प्र. में सत्ता का वनवास काट रही कांग्रेस और भाजपा की सत्ता से बिलबिलाती जनाकांक्षाओं को रीवा, छतरपुर जैसे स्तर हीन अनुशासन हीनता वाले घटनाक्रमों को न देखना पड़ता और न ही क्षत्रपों में बटी कॉग्रेस को जीत से पहले ही हार की रिहर्सल सरेयाम न करना पड़ती। 

देखा जाए तो जीत का मुगालता पाल या सत्ता की मलाई से बेदखल होने के डर से म.प्र. में मौजूद कांग्रेस क्षत्रपों की टोली के इसारे पर कार्यकर्ताओं के बीच ऐसी अनुशासनहीनता जनता के बीच कॉग्रेस के लिए कोई सुखद संदेश नहीं। 

मगर यहां यक्ष प्रश्र यह है कि आखिर कांग्रेस आलाकमान क्यों यह जरा-सी बात समझने तैयार नहीं कि जो छत्रप म.प्र. में 14 वर्ष के वनवास के दौरान स्वयं की सीटें बचाने में सफल रहे और कांग्रेस का बजूद बचाने में असफल वह ऐन चुनाव से 4 माह पूर्व आपसी संग्राम में सरेयाम सडक़ पर उलझ ऐसा कौन सा चमत्कार कर डालेगें। जिससे सत्ता की चाबी कॉग्रेस की झोली में आ गिरे। आखिर आलाकमान का अपने-अपने अस्तित्व बचाने में संघर्षरत इन क्षत्रपों पर इतना अंधविश्वास क्यों?

बल्कि यहां कांग्रेस आलाकमान को समझने वाली बात यह है कि 14 वर्ष तक सत्ता से दूर और देश भर में 2014 लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने वाली कॉग्रेस को इससे बुरा वक्त और क्या हो सकता है। जो वह आज भी इन क्षत्रपों की वैशाखियों के सहारे कांग्रेस की नैया 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार करना चाहती है। अब जबकि विधानसभा चुनाव में 3 माह व लोकसभा चुनाव में मात्र लगभग 8 माह शेष है। ऐसे में जीत का और स्वयं के जनाधार का दम भरते म.प्र. के क्षत्रप सत्ताधारी दल का क्या बिगाड़ पायेंगें इस पर आलाकमान को विचार कर आगे की रणनीति तय करना चाहिए।

इसमें कांग्रेस आलाकमान राहुल गांधी और उनकी सलाहकार टीम सहित सत्ताधारी दल को यह संदेह कतई नहीं होना चाहिए कि प्रबल, वैवस, मायूस एवं झूठे भाषणों से कराहती बिलबिलाती जनाकांक्षायें कॉग्रेस की ओर आशा भरी किरणों से राहुल जैसे साफ-सुथरे नेतृत्व  की ओर देख रहीं है। जिसका भरपूर सम्मान करते हुए राहुल गांधी को म.प्र. की कमान सीधे अपने हाथ में लें, अपना अस्थाई मुख्यालय म.प्र. की राजधानी भोपाल में 2018 के विधानसभा चुनाव ही नहीं, 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए बना लेना चाहिए। यहीं वो समय है जब वह अपने सामर्थ और पुरुषार्थ का बेहतर प्रदर्शन कर अपनी सार्थकता समुचे देश की राजनीति में सिद्ध कर सकते है। 

क्योंकि जिस तरह से राहुल के चेहरे को लेकर महाकौशल, विध्यं, वघेल, बुन्देलखण्ड सहित मालवा, चंबल ग्वालियर में लोगों के बीच उत्साह और उम्मीदें है। उन्हें देखते हुए कॉग्रेस अपना पक्ष रखते हुए सत्ताधारी दल से धारदार सवाल करने में स्वयं को सिद्ध कर पाती है और कांग्रेस समर्थित नये लोगों सहित मीडिया, सामाजिक, कार्यकर्ताओंं विधा, विद्ववान, चिन्तकों से सीधा संवाद कर, एक नई शुरुआत कर पाती है, तो निश्चित ही परिणाम कॉग्रेस के पक्ष में अप्रत्याशित हो सकते है। क्योंकि जिस तरह से अपने अहम, अहंकार में डूब म.प्र. के कांग्रेसी क्षत्रप अपने चेले-चपाटों से घिरे गिरोह बंद तरीके से कॉग्रेस का संचालन एवं संगठन का गठन कर, नूराकुश्ती में उलझे है। उसे देखकर नहीं लगता कि वह 14 वर्ष बाद  भी म.प्र. में कांग्रेस के पक्ष में बेहतर माहौल बना, कॉग्रेस का वनवास खत्म कर पायेगें। जो क्षत्रप अपने आचरण व्यवहार से 14 वर्ष ही नहीं, चुनाव से ठीक 4 माह पूर्व तक अपने अहम, अहंकार में डूब तथा अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा के घोषित-अघोषित तौर पर स्वयं के अस्तित्व के लिए लडऩे से नहीं चूक रहे। उनसे राहुल गांधी को बहुत अधिक उम्मीद नहीं रखना चाहिए। क्योंकि म.प्र. में कांग्रेस को लेकर आलाकमान के पास समझने बहुत कुछ नहीं। अगर समय रहते राहुल ने स्वयं शुरुआत नहीं की तो परिणाम चौथी मर्तबा भाजपा के ही पक्ष में रहें, तो किसी को इसमें संशय नहीं होना चाहिए और न ही राहुल गांधी को इस पर कोई संदेह। 
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