सिद्ध करने का, सार्थक मौका संभालना होगी स्वयं कमान

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है हर व्यक्ति, संस्था, संगठन को समय पर अपनी सार्थकता सिद्ध करने का मौका देता है। बशर्ते वह व्यक्ति, संस्था, संगठन समय की नजाकत भांप अपनी सार्थकता सिद्ध करने में, अपना सक्षम मार्ग प्रस्त कर सके। देखा जाए तो 2018 के 3 राज्यों के आसन्न विधानसभा चुनाव में खासकर म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान में कॉग्रेस के नये आलाकमान राहुल गांधी और कॉग्रेस की स्वयं सार्थकता सिद्ध करने का जबरदस्त मौका है। क्योंकि 2014 के जन दण्ड के बाद अपने परायों की स्वार्थ सिद्धि,चापलूूसी, चाटूकारी से जूझती कॉग्रेस एक मर्तवा फिर से विधानसभा चुनाव के मुहाने पर है। जहां वह अपनी सार्थकता सिद्ध कर, स्वंय को सक्षम, सफल साबित कर सकती है। क्योंकि वर्तमान परिवेश में समय परिस्थिति और जनाकांक्षायें उसके पक्ष में है। 

वहीं सार्थकता मुद्दें और उसका संगठनात्मक ढांचा मौजूद नेता मण्डली उनके अहम, अहंकार और अस्तित्व की जंग में कॉग्रेस की राह में सबसे बड़ी बाधा साबित हो रही है। जबकि इसके उलट सत्ताधारी दल जनधन के बल पर विगत 14 वर्ष से ही भ्रामक प्रचार-प्रसार कर, भोली-भाली मायूस, वैवस जनमानस को विभिन्न योजनागत प्रलोभनों के माध्यम से अपने पक्ष में करने में जुटा है। इतना ही नहीं कॉग्रेस का दुर्भाग्य यह भी है कि जब-जब कॉग्रेस आलाकमान संगठन में जान फूंकने और वैचारिक आधार को धार देने की कोशिश की है। फिर चाहे वह संगठनात्मक ढांचे का पुर्नगठन हो या फिर वैचाारिक आधार को नई दिशा देने की कोशिश हो। उनकी हवा निकालने कॉग्रेस के अन्दर ही ऐसे-ऐसे गोलबंद नेता मौजूद है। जो अपने-अपने अस्तित्व को बचाने विगत 25 वर्षो से कॉग्रेस के नाम पर अपना आधार सुरक्षित कर, कॉग्रेस को निराधार बनाने में जुटे है। 

कहते है कोई भी व्यक्ति, संगठन, संस्था की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब वह अपनी अनुशासनात्मक और उपोगिता युक्त शैली की सार्थकता जनमानस के बीच सिद्ध कर सके। इसमें भूतों न भविष्यते किसी को संदेश नहीं होना चाहिए कि कॉग्रेस एक ऐसा वैचारिक संगठन है जिसमें राष्ट्रीयता का प्रबल भाव होने के साथ आम जन के बीच न्याय पूर्ण उसकी कार्यप्रणाली रही है। जिसमें सभी वर्ग धन, जाति को विकास के समान अवसर उपलब्ध हो पाते है। क्योंकि कॉग्रेस ने विगत 70 वर्षो में यह सिद्ध करने की सार्थक कोशिश की है कि उसके विचार नीतियां निरर्थक नहीं। 

ये अलग बात है कि जीवन में व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह से समयकाल, खण्ड, परिस्थिति अनुसार लिए गए निर्णयों में चूक हो सकती है। मगर ऐसा नहीं कि उसमें सुधार की संभावना या गलती स्वीकारने की संभावना न हो। क्योंकि किसी भी व्यक्तियों के समूह की संस्कृति उनके संस्कार उन्हें भूल सुधार का मार्गदर्शन अवश्य देते है। हो सकता है कि कॉग्रेस में कुछ निर्णय गलत हुए हो, तो उन्हें खुले दिल से स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए और यह बात स्वयं कॉग्रेस नये आलाकमान राहुल गांधी देश के सर्वोच्च सदन एवं लोकतंत्र के मंदिर संसद में पूरे सदन के सामने उस सच्चाई को स्वीकार्य कर, अपने प्रतिद्विन्दी दलों को यह स्पष्ट संदेश देने में कामयाब रहे, कि कॉग्रेस प्रेम, भाईचारा और सर्वकल्याण के भाव के साथ कार्य करती है। भले ही लोग उनकी आलोचना करें या मचाक उड़ाए। मगर उन्होंने भरी सदन में प्रधामंत्री के गले लग, हमलावर सत्ताधारी दल को बैकफुट पर पहुंचने के लिए मजबूर कर दिया और वह देश के सर्वोच्च सदन में कॉग्रेस का अर्थ समझाने में कामयाब भी रहे। बहरहाल अगर हम म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान के संदर्भ में चर्चा करें तो  2018 के विधानस ाा चुनावों का संचालन आलाकमान ने सीधे स्वयं के हाथ न लेकर और उस पर नजर नहीं रखी, तो यह आलाकमान के लिए बड़ी 

विफलता होगी। क्योंकि जिस ढर्रे पर अस्तित्व की जंग में डूब, कॉग्रेस के नेताओं को पारघाट लगाने का दम भर रहे है। अनुशासन विहीन कार्यशैली इस बात के स्पष्ट संकेत है कि इससे कॉग्रेस का भला होने वाला नहीं और न ही इन तीनों राज्यों में वैवस, मजबूर अंधकारमय जनाकांक्षाओं को कुछ हासिल होने वाला है। क्योंकि इनमें पलीता कॉग्रेस के प्रतिद्विन्दी कम, स्वयं कॉग्रेसी ज्यादा लगाने में जुटे है। जनाकांक्षाओं से जुड़े सार्थक मुद्दे और प्रबल वैचारिक आधार के प्रस्तुतीकरण के आभाव तथा नये समर्थक वैचारिक, विद्यवान लोगों से समन्वय का आभाव लाख आलाकमान की कोशिशों के बावजूद यह अपेक्षा करता है कि कॉग्रेस आलाकमान को तीनों राज्यों की कमान अपने हाथ में रख, अपना वेसके प अस्थाई तौर भोपाल, जयपुर, रायपुर को बनाना चाहिए। क्योंकि जिस तरह से स्वयं के अस्तित्व की जंग में डूबे नेता कॉग्रेस की जीत का मुगालता पाले अनुशासन हीनता की सीमाएं लांग रहे है और आम कॉग्रेस समर्थक, वैचारिक विद्यवान लोगों को आलाकमान से सीधे संपर्क, संवाद के आभाव का लाभ उठा आम कॉग्रेस समर्थक को अपने अहम, अहंकार के आगे चापलूसी, चाटूकारी और गिड़गिड़ाने पर मजबूर है। 

इससे कई कॉग्रेस नेताओं का तो भला हो सकता है जो विगत 20 वर्षो से या तो सीधे सत्ता में भागीदार रह, अपने अस्तित्व को सीज, उसका आधार मजबूत बनाते रहे या जो लोग अघोषित तौर पर सत्ता से गलवईयां कर, स्वयं को मजबूत बनाए रखे। अब विचार कॉग्रेस आलाकमान और कॉग्रेस को करना है कि पंण्डित नेहरु, शास्त्री, इन्दिरा, राजीव गांधी के त्याग कुर्बानी की कर्जदार, इस कॉग्रेस को आलाकमान कैसे इन तीन राज्यों में सफलता दिला, इन राज्यों के भोले-भाले मायूस, वैवस, नेक दिल इंसानों को न्याय दिला, अपना सर्वोच्च योगदान एक बार फिर से भारतीय लोकतंत्र में सार्थक कर पाती है। 

ज्ञात हो कि राहुल स्वयं खुद को भी कॉग्रेस कह चुके है कि जब तक वह सीधी पकड़ के बाद समुचा संज्ञान इन तीनों राज्यों में होने वाले चुनावों को नहीं रखते, तब तक कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाए और कॉग्रेस को स्वयं सिद्ध करने का मौका देखते ही देखते हाथों से जाता रहे। तब फिर कॉग्रेस के पास पछताने और इतिहास के पन्नों में उस विचार को दर्ज होने में देर न होगी। जिसकी राष्ट्र भक्ति, जनभक्ति उसके संस्कार, संस्कृति पर कभी सवाल खड़े नहीं हो सके, जिसमें विचार अगर भविष्य में सवालों के कटघरे में, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 

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