चरण पादुका बनी मौत पादुका, 10 लाख गरीब, मजदूरों की जिन्दगी से खिलवाड़, वोट के लिए पागल सत्तासीनों का जघन्य अपराध

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। आखिर 21वीं सदी में कोई भी सभ्य समाज, लोकतांत्रिक संस्थायें, संगठन व लोकतंत्र को जिन्दा रखने की जबावदेही ओड़े लोग इतने स्वार्थी और निष्ठुर कैसे हो सकते है। जो वोटों की खातिर जनधन से जिन्दगी की बजाए मौत बांटने का कार्य कर गुजरे और समुची व्यवस्था ही नहीं, लोकतंत्र के स्तंभ मुंह में मुसीका डाल चुप रहने पर मजबूर हो। मगर सबसे बड़ी शिकायत तो उस चौथे स्तंभ से है जो धन पिपासूओं का सार्गिद बन प्रदेश में घटे इतने बड़े जघन्य घटनाक्रम पर चुप है और उन धन पिपासू मीडिया प्रबंधकों के आगे अपने स्वाभिमान को छोड़, अपनी पहचान मिटाने पर मजबूर है। जनता तो बेचारी भोली-भाली है। मगर सर्वाधिक जबावदेही तो हमारी अपनी है कि हम उसे सही रास्ता दिखा अपने पुरुषार्थ के बल एक मजबूत लोकतंत्र एवं प्रदेश के गांव, गली, गरीब, मजदूर, किसान, पीडि़त, वंचित, अभावग्रस्त लोगों के जीवन को समृद्ध, खुशहाल बना, आने वाली पीढ़ी के जीवन को सहज और समृद्ध, खुशहाल बनाए। 

मगर अफसोस कि प्रदेश से जिस तरह की खबर आ रही है और अगर देश के प्रतिष्टित अखबार पत्रिका में प्रकाशित प्रथम पृष्ठ दिनांक 25 अगस्त शनिवार 2018 की खबर सही है तो वोट के लिए पागल सत्तासीनों का चरण पादुका वितरण अभियान गरीब, मजदूरों के साथ जघन्य अपराध ही कहा जायेगा। प्रकाशित खबर की हेडलाईन कहती है कि केन्द्रीय चर्म संस्थान की जांच में खुलासा हुआ है कि म.प्र. में तेंदु पत्ता संग्रहको को सरकार की तरफ से पहनाए गए जूते, चप्पलों में खतरनाक रसायन एजेडओ पाया गया है। इन जूते, चप्पलों को पहनने से कैंसर होने की आशंका है। उक्त समाचार पत्र में अशोक गौतम (पत्रिका डॉट कॉम के हवाले से प्रकाशित खबर में उल्लेख है) कि सीएसआईआर (वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद) के केन्द्रीय चर्म अनुसंधान संस्थान चैन्नई की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। वहीं केन्द्रीय चर्म अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.केजे श्रीराम का वर्जन भी छपा है कि जांच में पाया गया कि इसमें कैंसर पैदा करने वाले रासायनिक रंग है। पांव में कांटा लगने, कटने और छाले पडऩे पर रसायन शरीर में जा सकता है। पसीना आने पर भी इसकी आशंका है। 

फिलहाल सरकार प्रदेश में 22 लाख 34 हजार तेंदु पत्ता संग्राहकों में जहां 11 लाख 23 हजार पुरुषों को जूते व 11 लाख 11 हजार महिलाओं को चप्पलें बांटी जानी है। जिनकी कीमत क्रमश: 195 रुपये प्रति जूते एवं 131 रुपये प्रति चप्पलों की कीमत है। जिनमें से खबर अनुसार अब तक 10 लाख आदिवासियों को जूते, चप्पल बांट चुकी है व 11 लाख जूते, चप्पल बांटने अभी स्टॉक में शेष रखे है। 

बहरहाल जो भी हो वोटों की खातिर आम गरीब को लुभाने जनधन से जिस तरह से तथाकथित चरण पादुका वितरण का अभियान संबल के माध्यम से शुरु हुआ। अब वह वोट कबाडुओ के लिए गले की हड्डी साबित होरहा है। आखिर कोई भी जनकल्याणकारी सरकार अपने ही गरीब मेहनकश मजदूरों की जिन्दगी से उन्हीं के धन पर कैसे खिलवाड़ कर सकती है। जो खिलवाड़ की खबर म.प्र. से आ रही है। आखिर कैसे उन बुद्धिजीवियों और स्वयं को इंसानियत का दूत कहे जाने वालों को नींद आ रही है। जिनकी आंखों के सामने वोट की खातिर इतना बड़ा जघन्य खेल हो गया। 

क्यों वह समाचार चैनल, अखबारों की यह खबर सुर्खियां नहीं बन सकी, जो जरा-जरा सी बेमतलब की बातों पर दिन-रात बहस कराते संपूर्ण पेज पर विज्ञापनों को छापते नहीं थकते। किसी भी स य समाज या लोकतंत्र को यह डूब मरने वाली बात होना चाहिए। जिनके प्रदेश में 100-200- हजार नहीं लगभग 10 लाख लोगों तक कैंसर जैसी घातक बीमारी पहुंचाने वाले जूते, चप्पल बड़े-बड़े समारोहों में करोड़ों रुपया जनधन से खर्च कर, बांटे गये। क्यों चुप है वह जनहित में याचिका कर्ता जब लाखों की तादाद में प्रदेश का जन अब ऐसे चप्पल, जूतों के संपर्क में है जिन्हें कष्ट हरने के नाम पर बांटा गया। इससे जघन्य अपराध शायद ही किसी भी सभ्य समाज और सरकार को कोई दूसरा नहीं हो सकता। जहां जनकल्याण के नाम इतना जघन्य कृत वोटों के लिए लोगों को लुभाने की खातिर खेला गया हो। 
जय स्वराज 
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