बेहाल विरासत, राष्ट्र बंधना की मोहताज

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है कि 10 वर्ष में तो घूरे के भी दिन बदल जाते है उस जगह पर बहुमूल्य खाद उपजाऊ भूमि या भवन बन जाते है। वहीं 60 वर्ष में पूरी की पूरी पीढ़ी बदल जाती है। मगर हमें महान भारतवर्ष के लोगों को तो स्वयं के द्वारा, स्वयं लिए, स्वयं स्थापित, लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोकतंत्र के पवित्र ग्रन्थ संविधान को अंगीकार किए 10-20 नहीं पूरे 70 वर्ष से हो चुके। जिसके मार्गदर्शन, सरंक्षण में न तो हम अपनी राष्ट्र निष्ठा सिद्ध कर सके, न ही राष्ट्र वंदना को सर्वोपरि मान, उसमें सच्ची आस्था व्यक्त कर सके। कारण हम विभिन्न मत पंच, धर्म, आस्था, जाति, क्षेत्र में बटे लोग, इन 70 वर्षो में सच्चे अर्थो में राष्ट्र का अर्थ उसका महत्व और उसका सच्चा अर्थ ही नहीं समझ सके और कभी जाति, धर्म, मंत पंथ के नाम पर ही एक दूसरे से संघर्षरत रह स्वयं स्वार्थ सिद्धी में जुटे रहे। 

देखा जाए तो राष्ट्र का अर्थ सिर्फ एक सरकार, उसका निर्धारित भूभाग और उस पर रहने वाले लोगों का मौजूद परिस्थितियों में अपना जीवन निर्वहन करना ही नहीं, बल्कि सच्चे अर्थ में राष्ट्र का मतलब उसका अर्थ उसकी महान सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, संस्कार, समर्पण के भाव के साथ सर्व कल्याण में निहित होता है। जिसके अपने कुछ जीवन मूल्य, सिद्धान्त स्थापित सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, स्वाभिमान के साथ उसकी वह नीतियां होती है। जिन्हें हम अपने समृद्ध, सुरक्षित, खुशहाल जीवन सहित समस्त जीवन जगत कल्याण के लिए स्वयं अपने विवेक, सामर्थ अनुसार निर्धारित करते है। 

अगर वाक्य में ही हम भारतवर्ष, हिन्द के लोगों की महान विरासत जंबूद्वीप, भरत खण्डे, आर्यवृत के उत्तरदाधिकारियों के रुप में है और हमारी गहरी आस्था उस महान सनातन संस्कृति में है। तो हमें हमारे महान ग्रन्थ रामायण, गीता से कुछ सबक अवश्य लेना चाहिए खासकर हमारे उन सत्तासीनों के साथ उन दल, संगठन, संस्था, नागरिकों को भी जो जनसेवा राष्ट्र सेवा और कल्याण का दम भरते नहीं थकते। सत्ताधीसों को जहां राजधर्म पालन के लिए हमारे प्रभु राम से उनके मर्यादित जीवन और प्रजा में विश्वास के साथ वचन रक्षा की सीख लेना चाहिए। जो उन्होंने इस महान भूभाग पर जीवन निर्वहन के दौरान अपने कर्तव्य निर्वहन के रुप में विपरीत परिस्थितियोंं के बावजूद राजधर्म के रुप में पालन किया। तो वहीं एक सच्चे सेवक की सीख लक्ष्मण जी लेना चाहिए जिन्होंने एक सच्चे सेवक की भांति दुर्भाषा ऋषि की हट के आगे राजा और प्रजा तथा राज मर्यादा की रक्षा के लिए, यह जानते हुए भी कि अगर उन्होंने राज आज्ञा का उलघंन किया, तो मृत्यु दण्ड सुनिश्चित है। उसके बावजूद भी उन्होंने एक सच्चे सेवक की भांति जहां राजा के धर्म, तो राज्य को मान स मान और प्रजा के कल्याण के लिए राज आज्ञा का उल्लंघन कर मृत्यु को स्वीकार किया। 

सीखना चाहिए उन नेता, जनप्रतिनिधियों को जो सुबह से ही कलफदार कुर्ता, पायजामा पहन जनता के धन पर लग्झरी कारों, हेलीकॉप्टर, हवाई जहाजों में बैठ, झूठ, मक्कारी, धूर्तता से सने भाषण, आश्वासन देने वोटों की खातिर अलसुबह निकल पड़ते है। 

सजग और सावधान होना होगा ऐसे नेता, दल, संगठन, संस्थाओं से जो आज तक अपनी सामर्थ, सार्थकता सिद्ध करने में असफल रहे, रक्षा करनी होगी अपने अमूल्य वोट व उस मत की जिसको यह सत्ता की सीढ़ी बना सत्तासीन होते है। रोकना होगा अपने बहुमूल्य वोट की ताकत से ऐसे दल नेता, संगठन, संस्थाओं को जो विगत 30 वर्षो से अपने धन, बल, षडय़ंत्र, धूर्त, मक्कारी झूठ के सहारे हमारा बहुमूल्य वोट हथिया सत्ता सुख उठा स्वयं व अपने वालो का संगठित गिरोह बना, जनधन व प्राकृतिक स पदा को लूट अपना धन, ऐश्वर्य बढ़ाते रहे है और स्वयं की स्वार्थ सिद्धि में जुटे रहते है। यह हमारा कर्तव्य ही धर्म होना चाहिए कि जो लोग सत्ता में रहने के बावजूद न तो हमारी शिक्षा, संस्कृति ही सुरक्षित रख सके न ही ऐसी व्यवस्था बना सके जो हमारी आस्थायें अंगीकार हमारे संविधान के अनुरुप ढल हम ऐसी राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण कर पाते। जिसकी बंदना अन्य बंदनाओं से पूर्ण होती, न ही वह ऐसा कोई आचरण, प्रस्तुत कर, स्वीकार्य कीर्तिमान स्थापित कर सके। जिसकी स्वीकार्यता आम जन के बीच राष्ट्र व जनकल्याण सहित सर्वकल्याण की आस्था पैदा कर सके। 

अगर आज भी हम सनातन को मानने वाले अपनी महान शिक्षा, संस्कारों की सिद्धता के साथ राष्ट्र बंदना का भाव लोगों में जाग्रत नहीं कर सके। तो निश्चित है कि आने वाले समय में हमारी महान शिक्षा संस्कृति का भारत आए विभिन्न शासकों, अंग्रेजो ने अपने स्वार्थो के चलते जो किया सो किया। मगर 70 वर्ष का लंबा सफर तय कर, हम वैभवशाली विरासत के लोग वह सबकुछ नहीं कर सके सिवाये खाने-पीने, जिन्दा रहने और बेहाल जीवन जीने के।

अगर आज भी  राष्ट्र वंदना से पूर्व अन्य वंदनाओं का दौर इसी तरह इस महान भूभाग पर स्वार्थ सिद्धि के लिए फलता-फूलता रहा तो निश्चित ही हमारी सुरक्षा, समृद्धि, खुशहाली अभी भी संदेहप्रद है। बेहतर हो हम अपनी महान सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों के साथ उस व्यवस्था को भी बेहतर बना एक ऐसी स्पर्शी, पारदर्शी स्वीकार्य प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप व्यवस्था का निर्माण करेंं, जिसके चलते लोगों में गहरी आस्था ही नहीं, अन्य वंदनाओं से पूर्व राष्ट्र वंदना का संचार हो सके और हमारा राष्ट्र एक मर्तवा फिर से सोने की चिडिय़ा और खुशहाल, समृद्ध, राष्ट्र के रुप में अपनी पहचान विश्वमान चित्र पर स्थापित कर सके। 
जय स्वराज 
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