देश को कॉग्रेस आलाकमान से सतत निर्णयों की दरकार

वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा। अनगिनत बहुमूल्य कुर्बानियों के बावजूद अपराधबोध से भरे, आरोपों के साथ चलते कॉग्रेस देश भर में कमजोर ही नहीं, कई प्रदेशों में सत्ता और आमजन के बीच से जमीदोष होती जा रही है। वह भी बगैर किसी अपराध के, हो सकता है, इसका प्रमाणिक भान देश के वैचारिक, वफादारों से संवाद, संपर्क विहीन कॉग्रेस आलाकमान को भी न हो। कारण 24 अकबर रोड़ से लेकर 10 जनपथ ही नहीं देश भर में फैले तथा-कथित स्वार्थी, महत्वकांक्षी, चापलूस वे क्षत्रप है। जो कॉग्रेस ही नहीं, कॉग्रेस आलाकमान की प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, कुर्बानियों को दांव पर लगा, स्वयं की स्वार्थ सिद्धि और महत्वकांक्षा पूर्ति के लिए स्वयं का अस्तित्व बचाने अपनी अहमीयत कॉग्रेस में बनाये रखे है या किसी भी कीमत पर गोलबंद रह बनाये रखना चाहते है। 

कॉग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि कभी समुचे देश में राष्ट्र, जनकल्याण की एक से एक बढक़र योजनाएं बनाने व क्रियान्वित कर, आम गांव, गली, गरीब, पीढि़त, वंचितों तक दिल्ली की सत्ता पहुंचाने उनकी भागीदारी सुनिश्चित कर, एक से बढक़र एक कुर्बानी देश की एकता अखण्डता के लिए देने के बावजूद तथा राष्ट्र व जन कल्याण सहित लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए नीतियां बना, राष्ट्र जनसेवा करने वाली कॉग्रेस आज समुचे देश के अधिकांश बड़े प्रदेशों से सत्ता से बाहर है और संगठनात्मक अस्तित्व के लिए संघर्षरत रह। ऐसे आरोपो से लन्छित हो रही है। जो अपराध उसने कभी किया ही नहीं सिवाये समय परिस्थिति अनुसार राष्ट्र व जनहित में लिए गए निर्णयों के अलावा। जिनकी सार्थकता आज स्वयं में सिद्ध है फिर भी इस कटू सच्चाई को देश के सामने रखने या मंचों से बोलने में तथा-कथित क्षत्रपों के गले सूखते है। जबकि विपक्ष बराबर झूठे मनगड़ंत आरोपों को लेकर हमेशा हमलावर बना रहता है। 

जिसका परिणाम कि उस कॉग्रेस को जिसके नेता आत्म व राष्ट्र सम्मान के प्रति लाख कोशिशों के बाद रक्षा करने में अक्षम रहते आघात से प्रांण गंवा चुके हो। जिन्होनें देश की एकता-अखण्डता एवं गरीबों, पीढि़त, वंचितों को उनका हक दिलाने स्वयं की जान और प्रतिष्ठा की परवाह न करते हुए राष्ट्र व जीवन मूल्यों सिद्धान्तों की रक्षा के लिए अपने प्रांण न्यौछावर कर, धधकती गोलियों और बम धमाकों की परवाह नहीं की और अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जिस तरह से आज काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक,जिस अपराधबोध के लिए कॉग्रेस को दोषी करार देश में दिया जा रहा है उस सच्चाई से आज मौजूद या आने वाली पीढ़ी अनभिज्ञ क्यों हो रही है। क्यों उत्तराखण्ड, हिमाचल, उत्तरप्रदेश, गुजरात, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली जैसे राज्यों में उसे सत्ता ही नहीं, संगठन को भी गवाना पड़ा।

यह विचारणीय प्रश्र होना चाहिए या फिर जिन राज्यों में खासकर छत्तीसगढ़, राजस्थान, म.प्र. में आज जिन तथा-कथित क्षत्रपों स्वार्थी, महत्वकांक्षियों के रहते 2018 के विधानसभा चुनावों पुन: सत्ता से दूर होने के कगार पर हैं। और लोकसभा 2014 में गठबंधन सरकार का दंश झेल 50 के आंकड़े पर सिमटी कॉग्रेस में ऐसा क्या हुआ जो उसे यह दिन देखना पड़ रहे है। जिसकी समीक्षा अवश्य कॉग्रेस आलाकमान को करनी चाहिए जरुरत पड़े तो अवश्य ऐसे स त निर्णय लेना चाहिए जिससे स्वार्थी महत्वकांक्षी क्षत्रपों को सबक मिल सके। आलाकमान को यह नहीं भूलना चाहिए कि भले ही देश भर के अधिकांश राज्यों में उसकी सत्ता सरकारें न हो और संगठन क्षत्रपों में बटा हो। मगर कॉग्रेस न तो देश और न ही विश्व में किसी परिचय की मोहताज है। आज भी अगर साधारण नागरिक कॉग्रेस का झण्डा ले, देश भर में निकल पड़े और कॉग्रेस की सच्चाई को देश के सामने रखें तो अच्छे-अच्छे संगठन सरकारों की हवा निकलना तय है। यह स्मरण भी अवश्य कॉग्रेस आलाकमान को रखना चाहिए।

कॉग्रेस को आज गठबंधन की नहीं,संगठन की जरुरत है। जिस तरह से छिन्न-भिन्न संगठन को कॉग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं छोडऩे के बाद स्व. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी ने खड़ा कर, कॉग्रेस को उसका मान-स मान, स्वाभिमान लौटा मजबूत बनाया था। वहीं कार्य आज भी कॉग्रेस स्वार्थी, चापलूस, चाटूकारों और महत्वकांक्षियों से दूर अपने वैचारिक सलाहकार, वफादारों की मदद से कर सकती है। जो आज भी देश भर के दूरांचल गांव, गली, गांव, नगर में बैठ इस आशा उम्मीद के सार आज भी अपनी वफादारी वैचारिक जि मेदारी कॉग्रेस के प्रति समझते है। मगर 24 अकबर रोड से लेकर 10 जनपथ ही नहीं, देश भर में स्थापित क्षत्रपों की इतनी जबरदस्त गोलबंदी है। कि कॉग्रेस आलाकमान कितनी ही कोशिश क्यों न कर ले, कॉग्रेस का मंच खाली रख नये लोगों को मंच पर बैठाने के लिए मगर इन क्षत्रपों की गोलबंदी के आगे जिस तरह से विगत 10 वर्ष से कॉग्रेस आलाकमान संगठनात्मक, वैचारिक, मजबूती को लेकर अक्षम, असफल रहा है। अगर कड़े निर्णय और सूचना, स पर्क, संवाद, सिस्टम में सुधार नहीं किया, तो इससे भी बुरे हालात कॉग्रेस को देखना पड़े, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 

क्या गठबंधन की राजनीति कॉग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल के लिए, उन दलों के साथ जिनका अस्तित्व, क्षेत्र, जाति, बाहुबल, धन, बल या फिर कॉग्रेसी वैचारिक आधार पर टिका है। क्या गठबंधन की राजनीति कॉग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल के हित में है। जबकि राजनीति में गठबंधन का आधार सत्ता में सिद्धान्त जीवन मूल्य से जुड़ी राजनीति न होकर केवल सत्ता लूट या स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखना मूल आधार बन हो गया हो। 

देखा जाये तो जितने भी क्षेत्रीय दल जो सत्ता में या सत्ता से बाहर अस्तित्व में है वे कभी न कभी कॉग्रेस का ही भाग रहे है और महत्वकांक्षा के चलते अलग-अलग रुप में अस्तित्व में है। जिनका न तो राष्ट्र जन से कोई लेना-देना न हीं उनका सिद्धान्त, जीवन मूल्यों से कोई लेना-देना और न ही क्षेत्र या स्वयं के अस्तित्व को छोड़ कोई उनका सशक्त सैद्धान्तिक वैचारिक आधार। इस सच्चाई के बावजूद कि चुनाव पश्वात गठबंधन की मजबूरी सिद्धान्त और नीतियों के सहारे तो उचित है। मगर चुनाव से पूर्व गठबंधन कॉग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल के लिए हित में नहीं। अगर आज की तरह कोई विषम परिस्थितियां है तो उसके लिए राजनीति में कूट-नीतिक गठबंधन की व्यवस्था है। आखिर यह सच्चाई कॉग्रेस आलाकमान के थिंक-टेक, वफादार क्यों बताने व समझाने में अक्षम है?  वह आखिर आलाकमान को विगत 2 दशक से क्यों नहीं बता सके कि गठबंधन की राजनीति कॉग्रेस जैसे बड़े व महान दल के लिए कितनी खतरनाक और नुकसानदायक है। 

कभी जिस कॉग्रेस के सिद्धान्त, मान-स मान और राष्ट्र की खातिर स्व.राजीव गांधी ने भी पूर्ण बहुमत न होने पर सिद्धान्त: सरकार बनाने या सरकार में शामिल होना अस्वीकार्य कर विपक्ष में बैठना मंजूर किया था आखिर क्यों? यह आलाकमान को समझने वाली बात होना चाहिए। आलाकमान को याद रखना चाहिए कि कॉग्रेस का इतिहास शुरु से ही समृद्ध, सुनहरा, त्याग, तपस्या, राष्ट्र, जनसेवा कुर्बानियों से भरा पड़ा है। और न ही  कॉग्रेस देश, विदेश में किसी पहचान की मोहताज, न ही उसका वैचारिक आधार आज भी इतना कमजोर हुआ है, न ही उसे किसी तथा-कथित, जनाधार विहीन या जनाधार वाले स्वार्थी, महत्वकांक्षी क्षत्रपों की आवश्यकता। 

कॉग्रेस आलाकमान को समझना होगा कि कॉग्रेस का इतिहास और कॉग्रेस नेताओं की त्याग-तपस्या, कुर्बानियोंं को। क्योंकि जब तक कॉग्रेस तथा-कथित स्वार्थी, चापलूस, महत्वकांक्षी और सत्ता के सौदागरों से मुक्त नहीं होगी। तब तक उसका कल्याण असंभव नहीं। जिसके लिए कॉग्रेस आलाकमान को कड़े निर्णय ले, सत्य जानने संपर्क, संवाद, सूचना के लिए वैचारिक, वफादारों की देश भर में बड़ी फौज खड़ी करनी होगी। जिससे सत्य का ज्ञान और अच्छे लोगों में कॉग्रेस की नई पहचान बन सके। बरना यहीं हाल रहा तो 2018 में म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान तो हाथ से जायेगें ही 2019 का महासंग्राम भी कॉग्रेस के लिए इतना सहज नहीं रह जायेगा जैसा कि तथा-कथित क्षत्रप बंधन-गठबंधन को सत्ता तक पहुंचने का मार्ग मानकर चल रहे है। क्योकि वह इस बात को लेकर पूरे आत्म-विश्वास से लंबरेज है। कि जब तक उनकी गोलबंदी क्षेत्र से लेकर 10 जनपथ और 24 अकबर रोड़ तक किलेबंदी में मजबूत है और आलाकमान के दरबारियों तक उनकी अकेली पहुंच तक तक उनका बाल बांका नहीं हो सकता।

समुचे देश में कोई कितना ही चिल्लाये या फिर 2014 की तरह अन्ना के नेतृत्व में समुचा देश खड़ा हो जाए उनकी जगह उनका इकबाल कॉग्रेस में बुंलद है। शायद यही कारण है कि कॉग्रेस को ऐसे दिन देखना पड़ रहे है। जो न तो उसकी विरासत रही, न ही वर्तमान और न ही उसका ऐसा भविष्य निर्णय कॉग्रेस आलाकमान और कॉग्रेस के उन वफादारों को लेना है जो यह मानते है कि कॉग्रेस ही नहीं, देश के लिए नेहरु गांधी परिवार की नि:स्वार्थ भाव से राष्ट्र व जनकल्याण के लिए बड़ी कुर्बानियां रही है। 

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