नैतिक पतन का नंगा, नाच कीमत में तब्दील कर्तव्य निष्ठा, सृजन पर भारी नई संस्कृति, सभ्यता

व्ही.एस.भुल्ले: सृष्टि, सृजन के संरक्षण, कल्याण के लिए ऐसी सत्ताओं, सेवा, सेवकों की कल्पना न तो राम राज्य, न ही प्रभु कृष्णकाल के दौरान आम प्रजा ने की होगी, न ही उन महान सूरवीर, संत, महात्मा, ऋषि मुनियों ने कड़ी त्याग-तपस्या, कुर्बानियां दें, ऐसे राज्य, शासन सत्ताओं को ऐसी सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों की विरासत छोड़ी होगी और न ही हमारे पूर्वजों ने कड़े संघर्ष के बावजूद हमें ऐसी नैतिक शिक्षा दी होगी। देखा जाए तो हमारे पूर्वजों ने जिस मान-सम्मान और स्वाभिमान व जीव जगत कल्याण के लिए कठिन तपस्या कड़ा संघर्ष कर, पीड़ा, बलिदानों की अनवरत मिशालें इस सृष्टि और सृजन में दी वह हमें अनुकरणीय होना चाहिए थी। मगर दुर्भाग्य कि हम ऐसा नहीं कर सके। 

इसके उलट जिस तरह से सेवा, कल्याण के नाम आजकल नैतिक पतन का नंगा नाच और कर्तव्य निष्ठा की कीमत वसूलने का खेल खुलेआम चल रहा है उसने इस सृष्टि में नैसर्गिक जीवन को ही अब धर्म संकट ही नहीं, बल्कि हमारे समाज को एक ऐसे विनाश की ओर धकेल दिया है जिसके चलते एक ऐसी निर्दयी संस्कृति और संस्कारों का जन्म हो रहा है जिसके रहते हमारे बीच की शान्ति, समृद्धि, खुशहाली कोसो दूर नजर नहीं आती। दिलों से गायब, प्रेम, दया, करुणा, सहयोग, विश्वास, ज्ञान तो अब, वह रत्न हो गये, जो अब ढूढ़े से भी मानव के बीच देखने, सुनने नहीं मिलते और मौजूद समाज में हमारे वह स्थापित महान संस्कार, संस्कृति, सभ्यता नजर आती है। 

जिस तरह से आज जीत के जुनून में संघर्षरत सत्ताओं का लक्ष्य सेवा, कल्याण छोड़, सिर्फ और सिर्फ सत्ता बन गया है। जिसे वह अपना धर्म मान उसे ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग मान चुके है। ऐसे में बिलबिलाती जनता जनार्दन को अब तो यह आभास होना भी असंभव हो गया कि सृष्टि, सृजन क्या है और मानव के रुप में उसके मूल्य और कर्तव्य क्या है। ऐसे में कीमत में तब्दील कर्तव्य निष्ठा और लूटपाट में तब्दील नैतिकता का नंगा नाच, न तो कभी हमारी सभ्यता रही, न ही हमारी संस्कृति, संस्कार और न ही हमारी विरासत। मगर सबकुछ बड़ी ही बेरहमी, निर्दयीता के साथ हमारी आंखो के आगे खुलेआम चल रहा है। 

ये अलग बात है कि इस दुव्र्यवस्था के प्रमाणिक प्रमाण हमारे सामने हो मगर वैद्यानिक प्रमाणिकता का अभाव, हमारी मौन स्वीकृति के रुप में अब हमारे सामने है। भय विहीन मानव सभ्यता इतनी निर्दयी अहंकारी, विनाशक होगी इसकी कल्पना शायद ही किसी भी तंत्र को स्वीकार या अंगीकार करने वाले उस मानव ने कभी की हो। जिसकी गहरी आस्था अपनी व्यवस्था शासक सत्ताओं में रही है। आज यहीं सत्ता शासक ही नहीं, आम चेतन्य नागरिकों की भी चिन्ता का विषय होना चाहिए। 

क्या सत्ता के लिए संघर्ष व जीत का जुनून और निहित स्वार्थ किसी भी व्यवस्था पर इतने हावी हो सकते है जो सृष्टि, सृजन को विसार एक ऐसी संस्कृति, संस्कारों के साक्षी होगें। जो सत्य को भी आंखे दिखाने से भी गुरेज न करें। दौलत, शौहरत, ताकत और सत्ता के जुनून में जन्म लेती निर्दयी संस्कृति भले ही किसी को अजीब न लगे। मगर अब इसके दुष्परिणाम मानव ही नहीं समुचे जीव-जगत के लिए घातक साबित होने लगे है। जिसने लोगों का सहज नैसर्गिक जीवन ही नहीं, समुचे जीव-जगत को खतरे में डाल दिया है। समय अब सोचने का नहीं बल्कि इस विचार का है। जो हमें इस संकट ग्रस्त, अशान्त जीवन से बचा सके। मगर यह तभी संभव है जब हम अपने जीवन मूल्यों के साथ उन मूल्य सिद्धान्तों का संरक्षण करें जिससे लोगों को सर्वोत्तम जीवन हासिल हो सके। यहीं मानवीय जीवन की किसी व्यवस्था में सबसे बड़ी सार्थकता होगी। 
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