कब खत्म होगा, संघर्षों का अंतहीन संग्राम, रोती विलखती जनाकांक्षायें

व्ही.एस.भुल्ले,विलेज टाइम्स समाचार सेवा। यह सत्य है कि समय और अज्ञानता बस अहम, अहंकार हमेशा से विनाश का कारण रहा है और स्वराज वह मार्ग है जिसके माध्यम से हम अपने-अपने कर्तव्य निर्वहन के साथ सृष्टि, सृजन में अपने जीवन का अमूल्य योगदान दे प्रकृति को समृद्ध और जीवन को खुशहाल बना सकते है। मगर यह तभी संभव है जब हम सत्य को साक्षी मान अपनी गहरी आस्था के माध्यम से अपने अन्दर उसे आत्मसात अंगीकार करने का आत्मविश्वास पैदा करे और सद ज्ञान के संरक्षण में आगे बड़े। क्योंकि हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि महत्वकांक्षा और नैसर्गिक जनाकांक्षाओं के बीच संघर्ष अनादिकाल से रहा है। 

कई मौकों पर समय काल परिस्थिति अनुसार अहम, अहंकारी महत्वकांक्षी सत्ताओं या ताकतवर लोगों द्वारा नैसर्गिक जनाकांक्षाओं को बड़ी ही बेरहमी से अपने बूटो तले कुचल, रौंधा जाता रहा है और ऐसी अहंम, अहंकारी महत्वकांक्षी सत्ताये ताकतें समय-समय पर स्वयं के विनाश का कारण भी बनी है। क्योंकि व्यवस्थायें जो भी रही हो समयकाल परिस्थिति अनुसार नैसर्गिक जनाकांक्षायें सर्वोपरि रही है। चाहे फिर वह कबीला, जगीरदारी राजा, महाराजा, बादशाह राजतंत्र रहा हो या फि लोकतंत्र और व्यवस्था रही हो या हो। मगर जब भी अहंम, अहंकार, महत्वकांक्षायें व्यवस्था में हावी हुई वहां जनाकांक्षायें अपमानित व तिरस्कृत हो अपने नैसर्गिक कत्र्तव्यों अधिकारों के लिए बिलखती रही है। आज जब हम जनतंत्र में है और हमारी समृद्धि खुशहाली हमसे कोसो दूर।

ऐसे में सृष्टि, सृजन में हमारा योगदान अहम हो जाता है। जिसे हम अपने निष्ठापूर्ण जीवन निर्वहन के माध्यम से सार्थक सफल उसे अंगीकार कर, ऐसी व्यवस्था में स्वयं की सार्थकता सिद्ध कर सकते है। जिसके लिए हमें सत्य सृष्टि, सृजन में स्वराज के योगदान को समझना होगा जो सहज भी है और नैसर्गिक भी और हमारी सत्तायें, संगठन, संस्थायें सहित हम स्वयं सटीक रुप में समझ इसे सिद्ध भी कर सकते है। काश अगर हम ऐसा कर पाए तो यह हमारी बड़ी उपलब्धि होगी। 
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