धूर्त दल, नेताओं के पीछे भागने से बेहतर, राष्ट्र व राष्ट्र नीति निर्माण में योगदान

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। आज की राजनीति में लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थाओं का बचाने तथा उन्हें और अधिक सक्षम जबावदेह बनाने आवश्यक है। कि हम सिर्फ धूर्त दल, नेताओं के पीछे भागने के बजाए स्वयं की सत्ता मेें सहभागिता सुनिश्चित करें और यह तभी संभव है जब हम हमारे पास मौजूद समय, सामर्थ की सिद्धता संगठनात्मक रुप से साबित कर, उन सत्ता सौपानों, संस्थाओं में पहुंचे। जहां हम अपनी आशा-आकांक्षा अनुरुप नीतियां बना एक ऐसा सशक्त, सक्षम, समस्या समाधान युक्त व्यवस्था निर्माण कर सके। जो उत्तरदायी भी हो और अपने कर्तव्यों के प्रति जबावदेह भी कम से कम उसकी इतनी प्रामाणिकता तो सिद्ध हो, कि वह 5 वर्ष में ऐसा जीवंत उदाहरण और व्यवस्था सुनिश्चित कर सके। जो भ्रष्टाचार मुक्त तथा झूठ-सच से कोसो दूर हो। मगर इसके लिए हमें उन दल नेताओं से दूरी बना, अपने संसाधन अनुसार अपने बहुमूल्य वोट की अहमीयत समझ, अपनी जागरुकता और कर्तव्य निष्ठा साबित करनी होगी।

कहते है कोई भी विचार, दल, संगठन गलत नहीं होता। अगर उनमें कुछ गलत होता है तो उन विचार, दल, संगठन को संचालित करने वाले वह लोग जो अत्यंत स्वार्थी और स्वयं सिद्ध होते है। जिन्हें न तो विचार, दल, संगठन के मान-सम्मान, प्रतिष्ठा में कोई आस्था होती, न ही जनकल्याण में। क्योंकि राष्ट्र व जनकल्याण में त्याग-तपस्या कुर्बानी का वह गारा लगता है जिसे न तो ऐसे लोगों ने भोगा न ही वह उस पर विचार करना चाहते। कारण आज हम एक गौरव, वैभवशाली, विरासत के उत्तराधिकारी होने के बावजूद भी नरकीय और दिशाहीन संघर्षपूर्ण जीवन जीने पर मजबूर है। क्योंकि जिन नेता, दल, संगठन, विचारों से उम्मीद थी आज वह अपने वह जीवन मूल्य और सिद्धान्त खोते जा रहे है। जिसके लिए वह अस्तित्व में आये थे। आज उनमें वह त्याग, तपस्या, कुर्बानी का भाव भी ओझल हो चला है जो उनके वैभव, गौरव का गान करता नहीं थकता था।

चूंकि हम एक महान लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत अपने महान संविधान को अंगीकार जीवन निर्माण व जन, राष्ट्र कल्याण के लिए  इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में है। ऐसे हमारा धर्म ही नहीं, कर्म भी है कि हम अपनी जबावदेही, उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ करें। ये सही है कि विगत 70 वर्षो की वोट राजनीति के छितड़े विकास और संसाधनों के अभाव में सड़ी ज्वार, बाजरा की रोटी और लानटेन, तार, चि_ी, पगडन्डी, गली से चलकर सडक़, हाईवे, लाइट, मोबाइल, इन्टरनेट तक आ पहुंचे है।

मगर इनकी हमें इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी जो न तो हमने, न ही हमारे पूर्वजों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। कभी डॉलर के बराबर का मूल्य रखने वाला रुपया गिरावट का रिकार्ड दर्ज करेगा या जो राष्ट्र और उसके गांव, गली, नगर, शहर कभी हस्टपुष्ट, स्वस्थ्य नागरिकों से भरा रहता था वहां कभी कुपोषण, अल्परक्त, मधुमेह के मरीजों की इतनी बड़ी फौज तथा टूटते बिखरते संयुक्त परिवार और कलंकित, संस्कृति, संस्कारों का ऐसा नंगा नाच होगा कि देखने सुनने वाले भी दांतों तले उंगली दबा ले। जिस सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों, संयुक्त परिवारों और सामाजिक पर पराओं के बल कभी विश्व भर में हमारी धाक थी और हमारे घर ही प्राथमिक शिक्षा, तकनीक के संस्थान थे। जहां रोजगार पैदा होने के साथ ही नहीं, प्रतिभा अनुसार सुनिश्चित होता था। आज उसी महान राष्ट्र, राज्यों में शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों के नाम कुख्यात पर परायें जन्म ले रही है तों वहीं स पदा से सरावोर हमारा भूभाग बेरोजगारी का दंश झेलने पर मजबूर है। 

अब इसे हम अपनी दरियादिली, अर्कमण्यता, आलसी, अज्ञानी स्वभाव कहे या अपनी नियती, कि आज भी हम उन झूठे, धूर्त नेता, दल, संगठन और उस भ्रष्ट राजनीति को झेलने पर बैवस मजबूर क्यों है। जो  सत्ता में वर्षो रहने के बावजूद हमारे बीच ऐसी कोई नजीर, सिवाए वोट मांगने व सत्ता सुख उठाने के प्रस्तुत नहीं कर सके जिस पर कि हम गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सके।

आज भी हम ऐसे नेता, दल, संगठन, विचार जो वह कभी जाति, क्षेत्र तो कभी धर्म के सहारे हमारी भावनाओं का लाभ उठा सत्ताओं में बैठ वर्षो सुख उठा स्वयं का कल्याण करने में जुटे रहते है और सत्ता से बाहर जाते ही एक मर्तवा फिर से सत्ता की तैयारी में जुट जाते है। देखा जाए तो उनका तो विकास हुआ है। मगर न तो हमारा, न ही आमजन का विकास कल्याण आज तक हो पाया।

ऐसे में आज हर बुजुर्ग, युवा का स्वयं ही नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कर्तव्य और जबावदेही बनती है कि वह झूठे दिखावों का दिवास्वप्न और चुनावों के दौरान दिए जाने वाले आश्वासन लक्षेदार भाषणों को छोड़, स्वयं के बीच के लोगों से ऐसे जनप्रतिनिधि चुन, ऐसी सत्ता निर्माण में जुटें जो हमारी आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के साथ ऐसी नीतियां और व्यवस्था निर्माण करें, जिससे जन, राष्ट्र कल्याण ही नहीं, सर्व कल्याण सुनिश्चित हो सके। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे ही वोट से लोग सत्ता सौपानों तक पहुंचते है और हमारे ही वोटों से सरकारें चुनी जाती है। अगर हमारा वोट हमने अपने ही बीच के लोगों को दिया तो निश्चित है कि नीतियां और व्यवस्था हमारे अनुकूल होगीं और सरकार के अगुआ भी हम होगें। मगर यह तभी संभव होगा जब आम बुजुर्ग, युवा चुनाव से पूर्व संगठित हो अपने वोट के माध्यम से दल, नेता छोड़ स्वयं के बीच के व्यक्ति को चुनने तैयार हों, न कि ऐसे नेता, दल, संगठन, वैचारिक लोगों को जिन्हें हम भावना या आशा-आकांक्षा या फिर किसी भी प्रकार के प्रलोभन नाते-रिश्तेदार, पहचान वालो या फिर धर्म, जाति, क्षेत्र के आधार पर वोट देते आये है और उन्हें कई मर्तवा जिताने के बाद भी आज हम नैसर्गिक जरुरतों और समस्याओं का दंश झेल उनके आगे पीछे घूमने गिड़गिड़ाने पर मजबूर होते है और जो हमारे ही टेक्स के धन या हमारी सार्वजनिक स पदा से प्राप्त धन के माध्यम से करोड़ों की सौगातें बांटने व सेवा कल्याण के नाम बड़े-बड़े जल से करा स्वयं की पीठ थपथपा स्वयं को किसी राजा, सम्राट या दानदाता से कम नहीं समझते। लोकतंत्र में वोट हमारा है और सार्वजनिक स पदा भी हमारी है। यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि क्योंकि यह अधिकार हमें हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था व संविधान ने हमें दिया है और राष्ट्र व जनकल्याण हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए जो हमारा उत्तरदायित्व भी है और जबावदेही भी।

अगर आज भी हम नहीं चेते तो अब ऐसे नेता, विचार, दल, संगठन हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतने सशक्त मजबूत है जो कभी जाति, धर्म, क्षेत्र, रुपया पैसा तक वोट हासिल कर, सत्ता हथियाने के लिए सक्षम सामर्थ बन दिल्ली, भोपाल ही नहीं, समुचे देश के गली, मौहल्लें, गांव, मजरा, टोलो तक बेहतर प्रबंधन और अकूत दौलत की दम पर जा पहुंचे। जहां पहचान, नातेरिश्तेदारी, सम्माननीय लोगों को वरगला या धर्म, जाति, बिजली, पानी, सडक़, तालाब, धार्मिक स्थल तथा विभिन्न प्रलोभनों के माध्यम से, किसी भी हालत में हमारा आपका वोट हासिल कर सके। जो नहीं होना चाहिए यहीं हर नागरिक का कर्तव्य उत्तरदायित्व और धर्म होना चाहए।

अगर हमें एक मजबूत समृद्ध, खुशहाल, नागरिक, परिवार, समाज, राष्ट्र का निर्माण कर अपना व अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वयं सिद्ध सक्षम, समृद्ध खुशहाल बनाना है तो हमें जागना होगा और उन संस्थाओं तक पहुंचना होगा जहां नीतियां बनती है और यह तभी संभव है जब हम अपने सामर्थ अनुसार अपने बीच से ही अच्छे-सच्चे सेवाभावी ईमानदार जन प्रतिनिधि चुने फिर वह किसी भी धर्म, जाति, गरीब, अमीर, किसान, मजदूर हो। 
जय स्वराज

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