सेवक, सार्गिदों की साजिसों में उलझा सेवा, कल्याण

व्ही.एस. भुल्ले/ विलेज टाइम्स समाचार सेवा 07 जून, 2018 | प्रमाणिकता का मुंह तांकते प्रमाण भले ही आंकड़ों की बाजीगरी पर कितनी ही आक्रोशित क्यों न हो मगर लगता नहीं कि सेवक और सार्गिदों की साजिसों के चलते, आशातित, अपेक्षित परिणाम इतनी आसानी से मिलने वाले हैं कारण साफ है कि अब सेवा, कल्याण, सर्वकल्याण का माध्यम न रह, स्वयं कल्याण का संसाधन बन चुकी है।  


वर्तमान हालतों के मद्देनजर जहां आज हमारे माननीय बेबस नजर आते है तो वहीं हमारे श्रीमानों का दर्द भी कुछ कम नहीं। क्योंकि सत्ता के लिए सियाशत का नंगा नांच और स्वयं कल्याण में जुटी सार्गिदों की फौज की हकीकत, सूचना क्रांति के दौर में अब किसी से छिपी नहीं इसलिए अब सिपहसालार भी स्वयं के स्वार्थ और हकों को लेकर काफी सजग और सावधान होते जा रहे है। और अपने हकों के लिए किसी भी प्रकार के समझौते या समझाइश के मोड में न रह, सर्वकल्याण के रास्ते से इतर नजर आते हैं। 

कहते हैं जब किसी भी व्यवस्था या समाज में व्यवस्थागत नीति सिद्धान्तों की वाध्यता, गौड़ नजर आने लगती है और नैसर्गिक तथा नीतिगत कर्तव्य, उत्तरदायित्वों का आभाव घर कर जाता है तो अव्यवस्था होना स्वभाविक है। जिसमें सर्वकल्याण के लिए क्रियान्वित प्रमाणों की प्रमाणिकता स्वत: ही समाप्त होने के कगार पर पहुंच जाती है और तब आशा आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सिर्फ और सिर्फ आंकड़े ही शेष रह जाते हैं। जो किसी भी खुशहाल, समृद्ध समाज या राज्य के लिए कलंक बन अव्यवस्था का कारण बन जाते हैं। 
ऐसे में सबसे अहम होता है कि हम अपने नैसर्गिक जीवन मूल्यों की रक्षा और अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों का निर्वहन निष्ठापूर्ण करें। जिससे एक समृद्ध, खुशहाल समाज व राष्ट्र का निर्माण होता है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि हमारा संविधान वाक्य में महान ही नहीं उन नैसर्गिक जीवन मूल्य और स्थापित सर्वोच्चतम व्यवस्था का हामी है। जरूरत आज, हमें वर्तमान समय की जिसकी जीवंत आत्मा और भाव को समझने की है। अगर हम अंगीकार अपने महान संविधान को समझ सकें तो कोई कारण नहीं कि कोई भी ताकत या हालात हमें समृद्ध शक्तिशाली, खुशहाल राष्ट्र बनने से रोक सके। क्योंकि भारत वह महान भू-भाग है जहां अदभुत ही नहीं चमत्कारी प्रतिभायें अनादिकाल से जन्म लें, भारत मां की गोद में खेलती रही हैं और जिन्होंने देश ही नहीं, विश्व मंच पर भी एक से बढक़र एक कीर्तिमान स्थापित कर, अपनी प्रमाणिकता और सिद्धता साबित की है।
जय स्वराज
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