वैचारिक विधान से ही संभव है, संकट का निदान, दिल बड़ा, दिमाग और दरवाजा खुला रखने की दरकार मगर, मंच पर मेरा स्थान कहां ?

वीरेन्द्र शर्मा विलेज टाइम्स समाचार सेवा।दिल्ली के रामलीला मैदान में जब नवनियुक्तकांग्रेस आलाकमान ने हजारों की संख्या में मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ता शुभचिंतकों वैचारिक लोगों से आव्हान करते हुए कहा था कि यह मंच मैंने आप लोगों के लिए खाली रखा है। तब देश के करोड़ों करोड़ लोगों ने कांग्रेस आलाकमान की इस बात को काफी गंभीरता के साथ लिया जब कांग्रेस आलाकमान ने बड़े लेवल पर संगठन में रद्दोबदल कर अपने प्रभारी मण्डलम गठन के लिए कई राज्यों में छोड़ें तो लोगों ने सोचा कि शायद अब उन्हें कांग्रेस मैं वैचारिक सम्मान मिलेगा। जिससे वह अपने पूरे पुरुषार्थ का प्रदर्शन कर, वह कांग्रेस की दिशा और दशा को दुरुस्त करने में कामयाब हो सकते है।

मगर विगत 4 वर्षों की तरह इन 4 महीनों में ना तो 24  अकबर रोड बदला ना ही कांग्रेस का दिल दरवाजा खुला और अपने पुराने सिपहसालारों के सहारे ही अकेली कॉग्रेस, भाजपा ही नहीं, देशभर मौजूद अन्य दलों से भी दो-दो हाथ करने चल पड़ी। कहते हैं कि हारे-थके सेनापति, सिपाही, सिपहसालारो में वो साहस, पराक्रम, पुरुषार्थ समय गुजरने के साथ नहीं रह जाता। सिवायें संवाद, समझौते और संधियों के। जिनके सहारे न तो किसी भी सियासत, सत्ता, सल्तनत, सम्राट, संगठन, संस्था को कोई कभी मान-सम्मान न मिल पाता है और न ही उसका स्वाभिमान ही अक्षुण रह पाता है। अंतोगत्वा कई मर्तवा तो उन्हें अपनी प्रतिष्ठा के साथ अपना अस्तित्व भी गंवाना पड़ जाता है।

बहरहाल जो भी हों, मगर जिस तरह से बगैर किसी नई रणनीत और नए जाबाजों के नये रंग रुप में तैयार वहीं पुरानी कॉग्रेस का लश्कर अपने पुराने सिपहसालारों, बफादारों के साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान की ओर बढ़ चला है और संधि, समन्वय के सहारे 2019 की तैयारी, उस सल्तनत संगठन से भिडऩे की कर चुका है। जिस पर ना तो रसद, पानी, वैचारिक बारूद और करोड़ों समर्पित सिपाही, सिपहसालार, सेनापतियों की कमी है। कारवां इतना बड़ा कि उसकी शाही सेना असलाबारुद के आगे कॉग्रेस का सैन्य सामान्य और सैनिक ऊंट के मुंह में जीरे के समान नजर आते है। जिस सार्थक, स्वीकार्य, वैचारिक आधार पर वह देशभर में फैल चुकी, एक ऐेसे दल की सल्तनत जिसमें न तो वैचारिक आपसी कोई घमासान है अब्बल आज उसके पीछे आधा सेकड़ा से अधिक उसके अनुवांशिक संगठन उसके एक इशारे पर उसके प्रतिद्विंयों को निस्तानाबूत करने तैयार खड़े रहते है।

ऐसे में समझने वाली बात यह है कि आखिर कांग्रेस के पास छोड़ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गंाधी के अलावा कौन सा ऐसा चेहरा या अलाउद्दीन का चिराग है जिसकी दम पर कांग्रेस 2019 में दिल्ली की गद्दी के लिए होने वाले भीषण संग्राम में उसे फतह दिला सके। या फिर वह दल जो कर्ई प्रदेशों में कॉग्रेस को निस्तनाबूत कर अपना-अपना अस्तित्व बनायें बैठे है। या फिर वह रणनीतकार जो 24 घंटे मुंगेरीलाल के सपने पाल 2019 में दिल्ली फतह का मुगालता पाले बैठे है। सच तो यह है कि जब तक कॉग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दिल-दिमाक और अपना दरवाजा खोल, आम कार्यकर्त्ता वैचारिक सहयोगियों, शुुभचिन्तकों को साथ लेकर वैचारिक, विधान की खोज में नहीं निकलते या संवाद, संपर्क स्थापित नहीं करते, तब तक मूर्छित पड़ी कॉग्रेस को संजीवनी मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
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