निष्ठा पर संदेह, सत्य से वगाबत भोले-भाले, मानस और बैबसी से झूठ, महापाप

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा, 31 मई 2018 | मध-मुग्ध सत्ताओं का सत्य से भीषण संघर्ष तो अनादिकाल से रहा है। मगर इतिहास कहता है कि वह कभी सफल सार्थक साबित नही हो सका। जिन कर्तव्य, उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए सत्तायें कभी दिव्य-भव्य रूप में अस्तित्व में रही है या है। ऐसी सत्तायें न तो तब और न ही अब की स्थिति में वह सृजन के मार्ग में अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकी। अपार शौर्य-शक्ति होने के बाबजूद वह सृजन के लिए अपनी न तो सार्थकता ही सिद्ध कर सकी और न ही औचित, और अन्तोगत्वा असफल होने के साथ ही वह अपना अस्तित्व भी खोती रही। जो समझने वाली बात है। 

क्योंकि आज जबकि स्थिति में हम एक मर्तवा फिर से अपने राष्ट्र, जन की समृद्धि, खुशहाली, कल्याण के लिए संघर्षरत है और आम जन भीषण संघर्ष के दौर में है। ऐसे में हमारी अपने-अपने लक्ष्यों की सार्थकता सिद्ध करने में सहमति, असहमति हो सकती है तो कुछ सत्तावत लोग इसे सिरे से नकार खारिज भी कर सकते है। तो कुछ सज्जन पुरूष इस मत को अपने बौद्धिक तर्क, कुतर्क, चिन्तन, कुचिन्तन के चलते अपने कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों के प्रति स्वयं की सत्य के प्रति निष्ठा भी साबित कर सकते है। मगर फिर भी सत्य यह है कि सत्तावत ताकतों की निष्ठा पर संदेह किए, बगैर राष्ट्र की भोली-भाली, मजबूर, बेबस जनता आज भी नैसर्गिक जरूरतों को लेकर परेशान है। और वह आतंकित, आभावग्रस्त जीवन  जीने पर मजबूर अब उसके पास उसके संघर्ष पूर्ण जीवन में वह ऊर्जा भी शेष नही, जिसके बल पर वह अपनी आवाज बुलन्द कर, उन राज दरबार, सिंहासन सत्ता, सभा परिषदों तक पहँुचा सके। जो उनके जीवन को सहज, सरल और समृद्ध बना सके। जो उनका राजधर्म भी है और जबावदेही भी। अब तों उन पथराई आँखों और लडख़ड़ाई जुबान में वो ताकत भी नहीं रही जो हस्टपुष्ट आँखों में आँखे डाल, सत्ता के कानों में वह विलाप कर, अपनी रुदन भरी सिसकियां सुना सके। जो उसकी न तो नैसर्गिक विरासत रही न हीं प्राकृतिक। अपनी नैसर्गिक समृद्धि पर मातम मनाने वाले उस बेबस मायूस नागरिक को यह भी नही पता कि उसी सांस्कृतिक, संस्कारिक कंगाली का आखिर कारण क्या है। 
आज जब सत्तावत मंचों से सत्य को मँुह चिड़ा सरेआम झूठ सुनाई व दिखाई देता है। तब पथराई आँखों की पुतलियाँ हरकत करना बन्द कर आँसुओं का भाव छोडऩे पर मजबूर बेबस नजर आती है। कौन नही जानता कि आज हाथों को रोजगार नहीं, बीमार को सहज इलाज नही, जीवन मूल्यों से जुड़ी शिक्षा नही, और आदर्श पदो पर आदर्श आचरण नही। मर्यादित पदों पर तार-तार मर्यादा चींख-चींख कर अपने अस्तित्व की रक्षा की गुहार लगाने पर मजबूर दिखाई देती है। ये अलग बात है कि आकड़े मन समझाने का आधार तो हो सकते है मगर समाधान का संकेत नहीं, समाधान तो अनुभूति और परिणाम बताते है न कि प्रमाण। अपनी, अकर्मण्यता, अक्षमता पर आकड़ों के सहारे उत्सव मनाने वाली सत्ताओं, सत्तावत लोग, सभा, परिषदों को यह नहीं भूलना चाहिए। कि अपने या अपने पूर्वजों के पुण्य प्रतापों से जो अवसर आज उन्हें प्रकृति, सृष्टि में सृजन का मिला है उसे अहम अंहकार और आंकड़ों की बाजीगिरी तथा सत्ता शोषण के लिए भावुक प्रलाप में नहीं गबाना चाहिए बल्कि प्रकृति, राष्ट्र, जनकल्याण के लिए भीषण पुरूषार्थ कर सत्य की किरण उन पथराई आँखों तक पहँुचना चाहिए जिससे उनकी चमक लौट सके जिससे वह कभी दुख तो कभी सुख में आँसुओं की अनुभूति समान रूप से कर सके और उनकी श्रवण शक्ति ऐसी  हो कि वह जीवन, समाज, मत इत्यादि वन्दनाओं के साथ राष्ट्र वन्दनाओं का श्रवण नैसर्गिक रूप से सुन सके, हो सकता है आज के अर्थ युग, संस्कार विहीन समाज और स्वार्थवत सत्ता, सभा, परिषद और स्वयं के लिए स्वार्थ सिद्ध जीवन जीने वालों को इसका कोई अर्थ न हो। और आज के आचार-व्यवहार संस्कार, संस्कृति से ओत-प्रोत जीवन में इन सबका मूल्य न हो। मगर सत्य से विमुख किसी भी मानव जीव जगत व्यक्ति परिवार, समाज, सत्ता, सभा, परिषदों का सत्य के अलावा और कोई समाधान नही हो सकता। 
जय स्वराज
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