समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र को नीति, नियत, नियोक्ता अहम

व्ही.एस. भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा 06 जून, 2018। राष्ट्र जन कल्याण को लेकर सत्ता के लिए देश भर के राजनैतिक दलों में जो संघर्ष छिड़ा है फिर चाहे भले ही उनके मार्ग, आरोप उपहास, उपेक्षा, आलोचना के वयंग बाणों के बीच से गुजरते हो। मगर इस बीच तथ्य विहीन, गढ़े मुर्दे उखाडऩे की संस्कृति समाज में जो जन्म ले रही है और साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति, राष्ट्र जन कल्याण के नाम, नीति, नियम न्योक्ताओं को लेकर राजनीति में सबाल खड़े कर रही है वह अब किसी से छिपा नहीं, जो गुजर गया वह इतिहास है जो सामने है वह वर्तमान, भविष्य को लेकर लहुलुहान दल, संगठन संस्था, व्यक्ति वर्ग अब सब सडक़ पर है ऐसे नीति, नियत और न्योक्ताओं का आचारण व्यवहार अहम हो जाता है। 

मगर बड़े बदलाव, कल्याण के लिए अहम हो चुकी सत्ता जिसे हासिल करने प्रकृतिक सत्य सनातन संस्कृति से दूर नैसर्गिक गुणों से दूर जब कोई मार्ग खोजा जाता है तो ऐसे संघर्ष, प्रयास न तो सार्थक होते है न ही सफल और वह कुचिन्तन के चलते ऐसी संस्कृति को जन्म देते है जो स्वार्थवत कुछ लोग, समूह, वर्ग के लिए तो सार्थक सफल होती है। मगर शेष जन समूह के लिए सार्थक सफल साबित नहीं हो पाती। जिसके विनासक परिणाम भविष्य में बड़ी वाधा है और वह कभी न कभी समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए कलंक भी साबित होते है फिर उन व्यक्ति परिवार, वर्ग, समाज के लिए मत, पंथ, वर्ग, राष्ट्र वन्दनायें सिर्फ चीख पुकार और विलाप के रूप में समिट कर रह जाती है न तो ऐेसे राज में लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल बन पाता है न ही वह राष्ट्र समृद्ध  शक्तिशाली बन पाता है। इसलिए जब तक नीत, नियत और न्योक्ताओं का आचरण, व्यवहार आत्मसात करने योग्य परिलक्षित नहीं होता तब तक हमारा भविष्य अंधकार मय ही बना रहेगा।
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