दोहन की अंधी दौड़ ले डूबी खुशहाली, सृजन छोड़, विध्वंश में मशगूल लोग

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। आजाद भारत में फिलहाल जितनी भी मानव जनहित विकराल समस्यायें मौजूद है उन सब के पीछे स्वार्थ का वह वीभत्स चेहरा नजर आता है। जो निहित स्वार्थो में डूब, अपने और अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर, राष्ट्र व जनकल्याण को दरकिनार करना चाहता हैै। विधित हो कि हमारे पूर्वज, ऋषि, मुनि, मार्गदर्शक इस बात से भली भांति परिचित थे कि हर जीव अपने नैसर्गिक गुणों के आधार पर स्वार्थी होता है। मगर सृष्टि में सृजन कार्य, औपचारिक अनौपचारिक तौर पर, पूर्ण निष्ठा से निर्वहन करना उसके अस्तित्व, उत्तरदायित्व में शामिल है। मगर सृष्टि में सर्वाधिक अपेक्षा नैसर्गिक रूप से सामर्थ, सर्वगुण स पन्न मानव से अधिक रखी गई। कि वह स्वयं कल्याण के साथ समस्त जीव-जगत का संरक्षण और कल्याण पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ करेगा। 

इसलिए हमारे महान भारतवर्ष के भूभाग पर हमारे पूर्वजों द्वारा अपने आचरण, व्यवहार, त्याग, तपस्या के बल पर ऐसी शिक्षा, संस्कृति का निर्माण किया जो हजारों वर्षो के लंबे अंतराल के बाद एक लंबा रास्ता तय कर, आज भी हमारे जहन में जिन्दा है। मगर आजाद भारत से कुछ वर्षो पूर्व या आजाद भारत में जिस व्यवस्था को हमने औपचारिक अनौपचारिक तौर पर अंगीकार किया उसे हम कभी आत्मसात नहीं कर पाए न ही अपने महान आध्यात्म आधारित शिक्षा, संकृति को बचा पाये। जो स यता, संस्कृति पर परायें हमें त्याग पुरुष और न्याय प्रिय बनाती थी हम उन्हें भी अक्षुण नहीं रख पाए, न तो हम अपने संयुक्त परिवार, स्वाभिमान, स मान, पड़ोस, नाते, रिश्तेदारी सुरक्षित रख सके, न ही हम उन लिखित-अलिखित आस्थाओं में विश्वास रख पाये। आजादी ऐसी कि सर्वकल्याण, राष्ट्र कल्याण भूल हम स्वयं के स्वार्थो में डूब अपने मानव होने की पहचान को कलंकित करते रहे। परिणाम कि कई ऐसी समस्याएं आज एक महान स यता, संस्कृति को कलंकित करने से नहीं चूकती।

और आज हमारा नैसर्गिक रुप भी सृष्टि में मौजूद हमारी खुशहाली, हमें मुंह चिढ़ा, दर्द, पीढ़ा भरा जीवन जीने पर मजबूर करती है। जिसके चलतेे कभी हम व्यवस्था के नाम विलाप करते है, तो कभी शौक मग्न हो जाते है। मगर खुशहाली कैसे हासिल होगी इसका उत्तर स्वार्थ की अंधी दौड़ में डूबे हम लोग नहीं खोज पाते। कभी दोष प्रकृति तो कभी अफसोस उस व्यवस्था पर जताते जो हमारे बीच से ही पोषित और संरक्षित है। नहीं तो क्या कारण है जो नीर, नदी, नाले, जल, प्रपात, झरने, तालाबों से पटे गांव, गली, नगर, शहरों में शुद्ध पेयजल के लाले है। जबकि प्रकृति आज वहीं की वहीं अपने नैसर्गिक स्वरुप में विराजमान है। हम तब भी तीनों मौसम, सर्दी, वर्षा, गर्मी को लेकर समृद्ध, खुशहाली थे। 

मगर आज समृद्ध तो है मगर शुद्ध पेयजल के आभाव में बेहाल है। कारण कि आज स्वयं प्रबंधन के  निहित स्वार्थो की अंधी दौड़ ने हमारे महान आध्यात्म, शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों में वह सर्वकल्याण, राष्ट्र कल्याण का भाव ही नहींं छोड़ा। जिसकी गोद में समृद्धि, खुशहाली खेलती है। आज जिस तरह से हम सर्व, राष्ट्र कल्याण को भूल उसकी भ्रूण हत्या कर, उसकी लाश के ढेर पर निहित स्वार्थ, स्वहित के ईट गारे से अहम, अहंकार, महत्वकांक्षाओं के महल खड़ा करने उतारु है। जिसके चलते हमारी पवित्र नदियां सूख, गन्दे नालों और वर्षाती नाले गंदी नालियां, तालाब, खेत, कॉलोनी तो झरने ऐस अययासी के अड्डे बन गये। जल प्रबंधन का कुप्रबंधन ऐसा कि रातों-रात कुबेरपति बनने की खातिर हम इन जीवनदायनी सरंचनाओं का संरक्षण, संरक्षित करने के बजाये उनका मास नोचने में जुटे है। 

कभी हमारी सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों, शिक्षा में नदी, बर्षाती नाले, तालाबों, कुओं को पैदा होने और नया जीवन शुरु करने के साथ पूजने की पर परा थी। जिनकों क्षति पहुंचाना अपवित्र करना महापाप माना जाता। जिसके लिए दोषियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था। आज ऐसे लोग आजाद भारत में आजाद है। न तो उनकी जीवनदायी इन जल श्रोतों में पूज्यनीय स मानीय कोई आस्था है, न ही संविधान का डर, न ही ऐसे कड़े कानून और न ही मौजूद कानूनों में कानून के श्रेष्ठ पालन हार। अब अगर ऐसे में शुद्ध पेयजल को लेकर इस महान भूभाग की आधे से अधिक आबादी शुद्ध पेयजल की मोहताज है तो इसका दोषी कौन? यह हमारे लिए विचारणीय प्रश्र होना चाहिए। 

उदाहरण बतौर हम भारत के म.प्र. में मौजूद शिवपुरी जिले को ही ले जिसका जिला मु यालय ही नहीं समुचा जिला तालाबों, वर्षाती नालों, कुओं, नदियों, झरनों से पटा पड़ा था जिसके 50 कि.मी. रेडियस में बेतवा, ऐर, सिंध, महुअर, पार्वती, कूनों जैसी नदियों का जाल बिछा है। 1200 से अधिक राजस्व ग्रामों वाले इस जिले में स्टेट टाइम में हर गांव में 1-2 सामान्य और निस्तारी तालाब, कुआ, बाबड़ी, चौपड़ा, झरने जैसे शुद्ध पेयजल के श्रोत हुआ करते थे। 

मगर दुर्भाग्य यह जिला आज सर्वाधिक पेयजल समस्या से प्रभावित है जिस जिले के जिला मुख्यालय नगर में 3 फीट खुदाई पर गीली मिट्टी और 20 फीट पर कुओं में पेयजल मिल पाता था। आज उस शहर में 800-1000 फीट तक जमीन के अन्दर जल श्रोत बचे, न ही तालाब, न ही बर्षाती नाले रहे। यहीं हमारी आजादी और निहित स्वार्थो की उपलब्धि का नायाब उदाहरण है। 

बहरहाल जो भी हो, काम बड़ा है, करने वालो का कारवां छोटा, अगर आज भी हम राष्ट्र सर्वकल्याण और सृजन को छोड़़ स्वयं स्वार्थ में डूबे रह तो जिनके लिए हम अकूत दौलत कमा जिनका भविष्य सुरक्षित करना चाहते है। न तो ऐसे हालातों में उनका जीवन सुरक्षित, सरंक्षित हो सकेगा, न ही वह कभी खुशहाल बन पायेगें जो हमारे जीवन की इस महान भूभाग पर बड़ी असफलता और आने वाली पीढ़ी के साथ अन्याय होगा और न ही ऐसी कलंकित विरासत हमारे बच्चों को स्वीकार्य होगी। 
जय स्वराज 

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