सवालों का जबाव सत्ता की जबावदेही, सार्थकता सिद्ध हो, यहीं राजधर्म

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। लोकतंत्र में चुनाव वह समागम होता है जहां सफलता, असफलता लोकतंत्र के इस महाकुंभ में डुबकी लगा, अपनी सार्थकता सिद्ध कर प्रमाणिकता की मिशाल कायम कर सत्ता की सार्थकता सिद्ध करती है। अगर चुनाव से पूर्व पक्ष-विपक्ष या आम जन के बीच सफलता असफलता या फिर सत्ता की सार्थकता को लेकर संशय पूर्ण कोई सवाल है तो सत्ता का यह राजधर्म होता है। कि वह अपनी सार्थकता साबित कर उसे सिद्ध करें कि विगत वर्षो तक सत्ता में रहने के साथ उसने राज्य व जनकल्याण के वो कौन-कौन से कार्य किये और इन कार्यो को लेकर उठने वालो सवालों की सच्चाई क्या है?

मगर सत्ता के क्रिया-कलापों को लेकर आजकल आम नागरिक और विपक्ष का विभिन्न विषयों को लेकर हमलावर होना इस बात के स्पष्ट संकेत है कि सबकुछ ठीक नहीं रहा। कम से कम सत्ता को अपनी मर्यादा और राजधर्म की लज्जा बचाने उन सवालों का जबाव अवश्य चुनाव पूर्व देना चाहिए जो यक्ष है। जनता का खुला आरोप है कि वह सत्ता संरक्षण सेवा कल्याण के नाम बेबस बेहाल है। क्योंकि सत्ता के अहलकार उनकी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान में अक्षम है। व्यवस्था में भ्रष्टाचार इतना कि बगैर लेन-देन कोई भी कार्य हो पाना असंभव है।

वहीं विपक्ष पूर्व से ही कई भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर हमलावर है। मगर जिस ई-टेन्डरिंग घोटाले को लेकर फिलहाल विपक्ष ही नहीं कॉग्रेस के प्रदेश सदर सहित म.प्र. विधानमण्डल में विपक्ष के नेता ने ई-टेन्डरिंग घोटाले को लेकर जो सवाल खड़े किये है। भले उसकी चर्चा मीडिया में व्यापक न हो। मगर सवालों का क्या, जब तक उन सवालों के जबाव सत्ता सार्वजनिक नहीं करती तब तक शायद सवाल भी यक्ष रहे और आम जन मानस भी संदेहस्पद। ऐसे में सत्ता अपने राजधर्म की रक्षा के लिए अपनी जबावदेही सुनिश्चित कर उसे संदेह और सवालों का पर्दाफास करना चाहिए। तभी हम एक अच्छे और सच्चे लोकतंत्र और जनता के सच्चे सेवक और शासक कहला पायेगें और यह सत्ता का धर्म भी होना चाहिए और कर्म भी। जिसका निर्वहन सत्ता का उत्तरदायित्व भी है।
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