आर्यवर्ते भरतखण्डे के स्वर्णिम इतिहास और उसकी दिव्य, भव्य, वैभवशाली विरासत की षडय़ंत्र पूर्ण, विकृत व्याख्या

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स, समाचार सेवा। पवित्र रामायाण, महाभारत के स्वर्णिमकाल से लेकर, यूनानी शासक डेमेट्रियस प्रथम, यूक्रेटीदस डेमेट्रियस, सिकन्दर, शक, तिब्बति, मुइशि, (यूची) कुषाण, नेपालवंशी शाक्य के बाद मध्यकालीन के आक्रमणकारी मदविन कासिम, गजनवी, गौरी, सुबुतगीन, बख्तियार, खिलर्जी, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तूमिस सुखबुद्दीन फिरोजशाह, मुईउद्दीन बेहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलवन, जलालउद्दीन खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरतशाह, तुगलक महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारकशाह, मोह मदशाह, अलाउद्दीन आलमशाह, बहलोल लोधी, सिकंदरशाह लोदी, बाबर नुरुद्दीन, सलीम, जहांगीर शाहजहां, औरंगजेब और अंग्रेजों तक, अगर हम स्वर्णिम विरासत के कुछ दौर को छोड़ दें, तो आक्रमणकारियों के शासन के दौरान जैसा भी इतिहास रहा हो। क्योंकि हम उसके साक्षी नहीं, निशंदेह हमारी पीढिय़ों ने अपनी भव्य, दिव्य, वैभव पूर्ण विरासत को बचायें रखने हमारी पीढिय़ों ने बड़ी पीड़ाये और दर्द को झेल, शौर्य के साथ कुर्बानियां दी है।  

ये अलग बात है कि कुछ का उल्लेख तो इतिहास में नहीं मिलता, तो कुछ की चर्चा इतिहास में होने के बावजूद आज उनकी चर्चा तक नहीं, मगर जो चर्चायें आजकल इतिहास गढऩे उताबली है वह दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। मगर यहां यक्ष प्रश्र यह है कि क्या हम इतने भी स्वार्थी हो सकते है कि हम अपने ही विचारों के माध्यम से अपनी महान विरासत, संस्कृति की हत्या कर स्वयं के स्वर्णिम इतिहास लिखने अपनी दुराग्रह कर अपने संस्कारों को कलंकित करें।

क्या सत्ता के लिए हम इतने स्वार्थी और संस्कारहीन हो सकते है जो अपने पूर्वजों की कीर्ति, त्याग, तपस्या को कुचल नया इतिहास रचने का दुसाहस करें। मगर दुर्भाग्य कि आजकल ऐसा देखने पढऩे हमारे महान भू-भाग आर्यवर्ते, भरत खण्डे पर निवास करने वालों को देखने सुनने मिल रहा है। देखा जाये तों समय परिस्थिति या स्वार्थ बस आजादी पश्चात जिस भी जैसे भी इतिहास को बढ़ाया गया हो, लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ महत्वकांक्षा को अमली जामा पहना कितना ही अत्याचार वैचारिक आधार पर क्यों न हुआ हो। मगर देश या देश वासियों के हित में कार्य न हुआ हो यह भी गलत है। मगर सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि खासकर म.प्र. में लोकतंत्र सैनानी के रुप में लोकतंत्र सैनिक होने की जो पूरी कीमत पेन्शन के रुप में बसूल रहे है। वह दौर तो सिर्फ इमरजेन्सी के दौरान  मात्र दो वर्ष 1975-77 तक रहा वह भी वैचारिक संघर्ष का परिणाम था जिसका शिकार समुचे देश के आम नागरिक को व्यवस्थागत झेलना पड़ा। 

मगर उनकी समुचे देश में सं या मात्र 6330 के लगभग थी। जबकि देश की आजादी के बाद आबादी करोड़ों में थी। जिसमें जनसं या नियंत्रण के लिए लाये गये कठोर निर्णय नसबंदी और अनुच्छेद 21 के तहत निजि स्वतंत्रता के मूल अधिकार से जुड़ा था। आज जब पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ मुखरता की बात होती है। तब श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया के नाम की चर्चा न होना, गढ़े जा रहे इतिहास की विश्वसनीयता पर प्रश्र चिन्ह लगाता है। जबकि कौन नही जानता कि राजामाता विजयाराजे सिंधिया को इन्दिरा गांधी ने जेल में डलवाया था मगर उन्होंने जमानत नहीं ली, कौन नहीं जानता जो भाजपा आज संगठन बल पर गरजती है। उसकी आवाज में राजमाता विजयाराजे सिंधिया के तन, मन, धन और समुचे संघर्ष पूर्ण जीवन का खून पसीना लगा है। यहां तक उन्हें जीवन पर्यन्त अपने इकलौते पुत्र और देश प्रभावी नेता श्रीमंत माधवराव सिंधिया से अलग रहना पड़ा। आज जब इमरजेन्सी के नायको में जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्रशेखर, जॉर्ज फर्नाडीस, लाल कृष्ण आडवाणी, चरण सिंह, मधु दण्डवते, मोगरजी देशाई, नानाजी देशमुख, नरेन्द्र मोदी, एचड़ी देवे गौड़ा, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार के अलावा तत्कालीन सरसंघ चालक वाला साहब देवरस, वैकेया नायडू, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, अनंत कुमार, रामविलास पासवान, दत्तात्रेय होसबोले, सुब्रमण्यम स्वामी इत्यादि की लोकतंत्र के रक्षकों के रुप में चर्चा है। ऐसे में राजमाता विजयाराजे सिंधिया के नाम को आज की चर्चा से विसार देना युवा या आने वाली पीढ़ी के साथ धोखा है। 

बहरहाल समझने वाली बात यह है कि एक लंबे समय पश्चात हजारों साल के संघर्ष के बाद जब एक मर्तबा हम पुन: भारतवर्ष का स्वर्णिम इतिहास गढऩे में सक्षमता की ओर बढ़ रहे ऐसे में छोटी मानसिकता सिर्फ हम और हमारी प्रमाणिकता पर ही सवाल खड़ा करती है। क्योंकि हमारा इतिहास और हमारी प्रमाणिकता हमारी भव्य, दिव्य, वैभवशाली विरासत ही नहीं हमारी महान संस्कृति में निहित है और हमारे संस्कार महान मानवता के नायाब उदाहरण। बेहतर हो हम सत्य को पूजने, मानने वाले सत्य से विमुख न हो। बरना न तो हमारी विरासत ही संरक्षित हो रह पायेगी। न ही वह महान संस्कृति जिसकी आज भी दुनिया कायल है। जो हमारे डीएनए में ही नहीं, हमारे संस्कारों में भी निहित है।
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