ये सियासी अदावत है या राष्ट्र जनसेवा में डूबा अहंकार,सब कुछ होने के बावजूद आखिर क्यों है श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया की शिवपुरी, दुर्दशा का शिकार?

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कभी राष्ट्र-जन कल्याण तो कभी जनभावना और उनके मान-सम्मान, स्वाभिमान की रक्षा के लिए राजमहल का वैभव छोड़ अहंकारियों से सडक़ पर दो-दो हाथ करने निकली स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जन भावना, जनकांक्षाओं को अपने अहंकार के बूटो तले कुचलने वाले म.प्र. के मुख्यमंत्री डी.पी मिश्रा और यहां तक की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से उनके ही संसदीय क्षेत्र में दो-दो हाथ करने वाली। और इमरजेंसी में जेल में रह जमानत न लेने वाली आयोध्या प्रकरण में जब लोग खुद के नामों को दूर कर टी.व्ही. पर दलीले देते थे तब कार सेवक के रुप में भगवान राम में अपनी गहरी आस्था व्यक्त करने वाली स्व. राजमाता विजयराजे सिंधिया ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। कि वह जिस दल, राजनेताओं को अपना खून, पसीना, धन लगा बगैर किसी अपेक्षा के दिन रात जुटी है। कल उसी दल की सरकार और उनके नेताओं के रहते उनकी प्रिय शिवपुरी को ऐसे दिन भी सियासी अदावत के चलते देखने होगें। जिनकी न तो कभी सहज स्वीकार्य होगी और न ही उन्हें सच्ची सेवा के रुप में देखा व जाना जायेगा।

विगत 10 वर्षो से विकास जनसुविधा के नाम कलफते लोग आज यह स्वीकारने तैयार नहीं कि पैसे, योजनाओं न ही जनप्रतिनिधियों की निष्ठा में कमी है। न ही उनकी ईमानदारी निष्ठा और निस्वार्थ सेवा में। जब 15 वर्षो से म.प्र. में व विगत 4 वर्षो से केन्द्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार है। स्वयं प्रधानमंत्री भी प्रधानमंत्री बनाने से पूर्व देश के प्रधानमंत्री भी भरी सभा में स्वयं सौभाग्यशाली कह चुके है। उनके क्षेत्र में सेवा के लिए इतना ही नहीं, म.प्र. के विगत 12 वर्षो से लगातार मुख्यमंत्री भी नही तीन मर्तवा सिन्ध की बात दोहरा चुके है। मगर शिवपुरी में एक से बढक़र एक सेकड़ों करोड़ की योजनाएं क्रियान्वयन होने के बावजूद एक भी मूर्तरुप आज तक नहीं ले सकी। 

आखिर क्या कारण है अब कलफते शिवपुरी वासियों को सोचना पड़ रहा है कि आखिर वह कौन से कारण है जो विगत वर्षो से अहम विभागों में अर्कमण्य अमला तैनात किया जाता है। कौन चलती योजना परियोजनाओं में अडग़ां लगता। कैसे महत्वकांक्षी योजनाओं को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया जाता है। कौन है वो लोग जिन्हे ठेके, खदान, अधिकारियों की पोस्टिंग में अधिक दिलचस्वी है। कई ऐसे अनगिनत सवाल है जिन पर शिवपुरी की जनता को विचार करना चाहिए। अगर इसी तरह सियासी अदावत और अहंकार का नंगा नाच शिवपुरी में चलता रहा तो कोई कारण नहीं कि मौजूद योजनाऐं ठण्डे वस्ते में और सेवा और सुविधाओं का अकाल पड़ जाये। जो न तो सुखद कहा जायेगा, न ही सार्थक। 
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