सज्जनों की सहभागिता, सृजन और सत्ता में सुनिश्चित करने, स्वराज मार्ग दर्शित कार्यक्रम करेगा

सृष्टि, सृजन, मानवता, जीवजगत प्राकृतिक सिद्धान्तों की रक्षा हेतु वैचारिक रूप से संघर्षरत स्वराज को सटीक दिशा देने वाले स्वराज के मु य संयो...

सृष्टि, सृजन, मानवता, जीवजगत प्राकृतिक सिद्धान्तों की रक्षा हेतु वैचारिक रूप से संघर्षरत स्वराज को सटीक दिशा देने वाले स्वराज के मु य संयोजक व्ही.एस. भुल्ले ने निर्णय लिया है कि स्वराज सृष्टि में मौजूद जीव जगत प्रकृति मानव कल्याण और उनकी समृद्धि खुशहाली के लिए सज्जनों की सृजन व सत्ता में सहभागिता सुनिश्चित करने सार्थक, सफल प्रयास की कोशिश करेंगा। क्योंकि वक्त आ गया जब मानव को एक मर्तवा फिर से सृष्टि में अपनी सार्थकता सिद्ध करनी होगी तभी वह उस महान भू-भाग के महामानव कहला पायेंगे और यह तभी स भव है जब हम संगठित हो सृजन और सत्ता में सज्जनों की सहभागिता सुनिश्चित कर अपने-अपने कर्तव्य उत्तरदायित्व का पूरी निष्ठा से निर्वहन कर पाये।

अब समय आ गया जब हम जीव जगत, पशु-पक्षी और मानव में अन्तर ही नहीं इनके बीच संतुलन स्थापित कर पाये। देखा जाये तो आज जिस तरह से जीव जगत पशु प्रवृति ही नही, मानवता के मार्ग में सटीक, स्वीकार सोच कि जो कमी आई है। जिसके कलंक से हम कभी अछूते नहीं रह पायेंगे। क्योंकि महान भारत वर्ष का जब भी अब इतिहास लिखा होगा तो उसमें हमारा उल्लेख एक कलंकित पीढ़ी के रूप में न हो और जिसके लिए आने वाली पीढ़ी हमें दोषी न ठहरा पाये उसके लिए हमें कठिन परिश्रम के साथ अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा से करना होगा।  क्योंकि आज की स्थिति के लिए न तो हमारे पूर्वज दोषी हैं और न ही वह आज की स्थिति के लिए दोषी ठहराये जा सकते। इसलिए मानवता का उत्तरदायित्व ही नही यह उसकी जबावदेही भी है कि वह सृष्टि, सृजन का कार्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से करें।
दोषी तो वह मानवता ठहराई जायेगी जिसका स पूर्ण विश्वास पशु प्रवृति में है, न की मानवता  में।  दोषी तो वह लोग और जीव भी नही होंगे जो प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरूप पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए संघर्षरत है आज विचार-चिन्तन का विषय यह नही कि मानव अपनी मूल प्रवृत्ति के विरूद्ध क्या रहा है, विचार चिन्तन का विषय तो यह है कि मानव चिन्तन जोकि शुद्ध कुचिन्तन में डूब सृष्टि के विरूद्ध प्रकृति से क्यों लड़ रहा है जहाँ उसकी सार्थकता सफलता शून्य है। यही अन्तिम सच है, इस पर वाद-विवाद हो सकता, कुचिन्तन पूर्ण तर्क भी हो सकते है। मगर स्वराज के प्रति आस्था चिन्तन राष्ट जन कल्याण सहित प्रकृति के सिद्धान्तों की रक्षा के लिए संघर्ष  मानवता का मार्ग हो सकता है। स्वराज के लिए संघर्षरत स्वराज के मु य संयोजक जिनकी आस्था नैसर्गिक प्रकृति प्रदत्त सिद्धान्त व अलिखित संविधान और अहिंसा को लेकर वैचारिक रूप से प्रबल है। उनका मानना है कि जब तक सज्जनों माता-बहनों  बच्चों की सहभागिता सृजन और सत्ता में सुनिश्चित नही होगी तब तक संघर्षरत रहने के बाबजूद भी पशुता, बेवशी और मजबूरी भरा जीवन जीने को मजबूर रहना पड़ेगा।
जय जय श्रीराम, जय स्वराज।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सज्जनों की सहभागिता, सृजन और सत्ता में सुनिश्चित करने, स्वराज मार्ग दर्शित कार्यक्रम करेगा
सज्जनों की सहभागिता, सृजन और सत्ता में सुनिश्चित करने, स्वराज मार्ग दर्शित कार्यक्रम करेगा
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