सत्ता प्रेम में कराहता स्वराज: सत्ता स्वार्थ त्यागे बिना असंभव है राष्ट्रवाद

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते है स्वार्थवत सत्तायें, संगठन, संस्थायें या इनसे जुड़े लोग अवसर पूर्व ही प्रतिभा दमन को अपने अहम अहंकार और सतत सत्ता प्राप्ति के हथियार बना ले तो, ऐसे में न तो राष्ट्र, जनकल्याण संभव होता है। न हीं लोंगो में राष्ट्र, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता का भाव जाग्रत हो पाता है। क्योंकि किसी के प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक गुण उसकी प्रकृति, प्रतिभा को रोक पाना असंभव है। जिस तरह सत्य पर विजय पाना असंभव है। और आज की सत्ता, संगठन, संस्था व कुछ लोग यहीं करने का दुस्साहस अपने थिंगटेक, चैले चपाटे, दरबारियों के चलते करने की असफल कोशिश करने में जुटे है। यह सच है कि वह अपने सत्ता, धन, बल के सहारे विद्या, विद्ववान और प्रतिभाओं का अवसरों से पूर्व कत्लेयाम करने का दुस्साहस पूर्ण कार्य अपने आचरण, व्यवहार से कर रहे है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।

सत्य यह है कि जिस तरह से स्वराज को समझे बगैर अधकुचले ज्ञान के सहारे सत्तायें, सत्ताधन बल का दुरुपयोग कर, किसी भी विचार की भ्रूण हत्या पर उतारु है। इससे साफ हो जाता है ऐसी सत्ता, संगठन, संस्था और लोग कुचिन्तन का शिकार हो। सत्य से सामना कर उससे दो-दो हाथ करने तैयार है। अर्थात वह अहम, अहंकार में डूब, प्रकृति की उस महाशक्ति को भी चुनौती दें, गूगल गुरु और आईटी जैसी विषकन्याओं का सहारा प्रतिभाओं के सरेयाम कत्लेयाम के सहारे उनका अन्त और सेवा कल्याण के नाम सत्ता सुख भोगने का मुगालता पालने वालो को पता ही नही कि खुशहाल जीवन किसी दुकान पर नहीं बिचता। प्रतिभा निर्माण किसी उघोग में नहीं होता। 

फिर स्वार्थवत सत्तायें नये मंत्रालय खोले या फिर स्कूलों में पहुंच स्वयं की सर्वोच्चता स्थापित करने बच्चों के बीच विलाप करें। इस तरह के छदम पूर्ण आचरण, व्यवहार से कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि अच्छे साध्य की प्राप्ति हेतु उत्तम साधन, चरित्र, आचरण, व्यवहार के साथ सर्वकल्याण की सोच की आवश्यता होती है। साथ ही सर्वकल्याण हेतु कोई ऐसा विजन, डिटेल, डीपीआर जिसके परिणाम प्रमाण सहित प्रमाणिक हो। 

ऐसे में समझना होगा उन स्वार्थवत सत्ता, संगठन, संस्थाओं को और अहम, अहंकार में डूबे उन रणनीतकारों को, कि अगर उनका द ाल आध्यात्म में है। तो आध्यात्म की भाषा में समझे अगर उनको विज्ञान में सिद्धस्त प्राप्त है तो वह विज्ञान के सूत्रों से समझे। कि किसी की नैसर्गिक, प्रकृति प्रदत्त गुण, प्रतिभा कभी न कोई इस पृृथ्वी पर रोक खत्म कर पाया है, न ही कर पायेगा। उसका सदउपयोग जीव, जगत, मानव, कल्याण में सृजन हेतु किया जा सकता है, न कि उसकी ऊर्जा, जो विस्फोटक होने के साथ चलायमान है को रोक नष्ट किया जा सकता। अगर प्रकृति विरुद्ध आध्यात्म विज्ञान में जब-जब ऐसा हुआ है उसके परिणाम विनाश के रूप में ही प्राप्त हुये है। जिस तरह नदी, अग्नि, वायु, जल के वैग को नहीं रोका जा सकता। सिवाये उपयोग पश्चात उसका रास्ता खुला रखने के इसी प्रकार विधा, विद्ववान, प्रतिभाओं का सृजन कल्याण में तो उपयोग हो सकता है। मगर दमन के रास्ते उसे रोका या नष्ट नहीं किया जा सकता। अन्यथा की स्थिति में परिणाम किसी भी व्यवस्था समाज को घातक हो इससे इन्कार भी नहीं किया जा सकता है। 

जिस तरह से विज्ञान में प्रमाण परिणाम मय प्रमाणिकता के हासिल करने सूत्र, फॉरमूलों का अहम रोल होता है। उसी प्रकार आध्यात्म में सदआचरण, व्यवहार सोच का प्रमाण, परिणाम, प्रमाणिकता में अहम रोल होता है। 

बेहतर हो सत्ताये, संगठन, संस्थायें और अहम अहंकारी लोग इस सत्य को समझने की कोशिश कर, अपने कत्र्तव्यों का निष्ठा पूर्ण निर्वहन करें, बरना बहुत देर हुई तो हमारे पूर्वजों की त्याग, तपस्या पुण्यायी, यूं ही अहंम, अहंकार के बूटो तले रौंधदी जायेगी। जो न तो जन हित में होगी, न ही राष्ट्र कल्याण में। अब विचार राष्ट्र जन, विद्या, विद्यावान, सज्जन, प्रियजन, राष्ट्रवादी उन संगठनों को करना है कि हम सृजन के रास्ते को चुनना चाहते है या प्रकृति विरुद्ध विनाश का रास्ता।
जय स्वराज
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