अक्षमता पर उत्सव, बैवस आंखो का सन्नाटा किस तबाही के संकेत

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। कहते जड़ीय चिकित्सा के अभाव में नासूर भी मरीज को तिल-बिल कर मरने मजबूर कर देता है। ठीक उसी प्रकार अक्षम स्वार्थी लोगो का समूह, व्यवस्था, सेवा के नाम आम भोले-भाले नागरिक, परिवार, समाज ही नहीं समुचे राज्य का जीवन संकट में डाल उसे बैवस, संघर्ष पूर्ण और दुखद जीवन जीने पर मजबूर कर देता है। देखा जाये तो आज के परिवेश में खुद को महान साबित करने, अक्षम उत्सवों में जिस तरह से भोले-भाले नागरिक अपनी आशा-आकांक्षाओं को खुली आंखों से जब तार-तार होते देखते है। तब उनकी आंखों में एक बैवसी भरा सन्नाटा पसर जाता है। आखिर यह सन्नाटा किस सृजन, तबाही का संकेत है यह तो सृजन के बीच समय काल परिस्थिति ही तय कर सकती है। मगर बैवसी के बीच अवतरित श्रंगारियों का आचरण, व्यवहार इस बात के स्पष्ट गबाह है कि आम गांव, गरीब ही नहीं व्यवस्था में आस्था रखने वालों के साथ बड़ा अन्याय और धोखा हो रहा है। अधिकारों के उन्माद में डूबी भीड़ को शायद नैसर्गिक शिक्षा, संस्कार और जीवन मूल्यों की पहचान के अभाव अब यह एहसास ही नहीं बचा कि क्या सही क्या गलत हो रहा है। वह तो वैचारे बस जल्द से जल्द अधिक धर्नाजन और स्वयं के जीवन को स्वयं की समझ अनुसार उ दा सक्षम, समृद्ध, सफल बनाने के जुनून को लेकर निर्भीक होकर चल पड़ा है। 

क्योंकि जनधन पर छवि चमकाऊ श्रंगारियों की फौज सत्ता सौपानों में अब सेवा, कल्याण से इतर स्वयं को महान और अपने अपनो की समृद्धि, कल्याण में जुट पड़ी है। जिनके पास जनधन के बल पर मौजूद छवि चमकाऊ चैलो, नौकर, पैरोकार, ठेकेदार की इतनी ल बी फौज, पर्याप्त पैसा पाकर प्रचार-प्रसार करने मौजूद है सेवा, कल्याण विकास के नाम ऐसे-ऐसे फंकारों की मण्डलियां मौजूद है जो विधि स वत तरीके से जनधन पर छवि चमकाऊ लोगों को आर्थिक रुप से पुरुषकृत कर श्रृगांरियों को महान बनाने के अभियान में जुटी है। 

मगर भोले-भाले गांव, गरीब को क्या पता कि उसे न तो वह जीवन मूल्य आधारित विकास उन्मुख व संस्कार युक्त शिक्षा मुक्त में नसीब है न ही जीवन के लिये पीढ़ा झेलते उन मरीजों का सहज मुफत स्वास्थ सेवा, शुद्ध पेयजल मौजूद है। शिक्षा, स्वास्थ, पेयजल सेवा का क्षेत्र आजकल, बाजार उन्मुख व्यवस्था, व्यवहार से पटा पड़ा है। सुरक्षा, संसाधन, रोजगार का आलम यह है कि हजारों लाखों रुपये की गाड़े पसीने की कमाई फूकने के बावजूद भी अपनेा के ही बीच उन्हें सहज उपलब्ध नहीं। 

अब तो सोशल मीडिया में डूबी हमारी युवा, बुजुर्गो की पीढ़ी से ही व्यक्ति, परिवार, समाज को एक बड़ी उम्मीद हो सकती है। जो लोगों के प्रकृति प्रदत्त जीवन को जहन्नदुम बनने से रोक सकती है। इन्सानियत के लिये इस पर विचार अवश्य होना चाहिए, बरना ऐसा न हो कि विकास की ओर बढ़ती हमारी सुन्दर व्यवस्था, सत्ता श्रंगारियों के रहते एक कुरुप व्यवस्था में बदल जाये। इसलिये अब हमें लोगों के दावे, वादे रैली उत्सवों से दूर यह सोचना है कि सत्ता सरकारों में कैसे लोग होना चाहिए न कि जाति, धर्म प्रलोभनों के प्रचार में पड़ अपने सुन्दर जीवन के संकट में डालना चाहिए यहीं वक्त है। जब हम अपने प्रकृति प्रदत्त सुन्दर जीवन की रक्षा करने में सफल, सक्षम बन अपने पुरुषार्थ को सिद्ध कर, मानव होने की मिशाल प्रस्तुत कर सकते  है। 
जय स्वराज 
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