सत्ता, स्वार्थ से सनी सियासत कभी सार्थक सफल नहीं रही, भोले-भाले अभावग्रस्त, खुशहाल जीवन को संघर्षरत नागरिकों की आशा, आकांक्षा, भावनाओं का सेवा, विकास, कल्याण के नाम शोषण, लोकतंत्र पर कलंक

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: राष्ट्र, जन, सेवा, विकास कल्याण को लेकर देश ही नही राज्यों तक में विगत तीन दशक से जिस तरह से सत्ता, स्वार्थ से सनी सियासत का जो सियासी संग्राम भोले-भाले अभावग्रस्त, खुशहाल जीवन के लिये संघर्षरत नागरिकों की आशा, आकांक्षा व विकास, कल्याण के नाम जो शोषण हो रहा है। निश्चित ही वह लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं स्वयं लोकतंत्र पर भी कलंक है। कहते है सजग सत्ताये कभी सच्ची सेवक, विकास उन्मुख, कल्याणकारी होती थी तो वही दूसरी ओर सत्तायें स्वार्थ और सत्ता तक सीमित रह, समुची व्यवस्था के लिए सत्यानाशी और विनाशकारी भी  होती है। मगर आज जब परिणाम शून्य सत्तायें अपनी सेवा उपलब्धियों के कितने ही प्रमाण अपने संसाधनों शुभचिन्तकों के माध्यम से जनमानस के बीच प्रस्तुत क्यों न करें, मगर अनुभूति के अभाव में वह हमेशा से ही असफसल और निरर्थक साबित होती रही।

आलम यह है कि आज बच्चे, युवा, बुजुर्गेा के सामने एक भी ऐसा प्रमाण, प्रमाणित रुप से मौजूद नहीं जिसे देख, समझ, सहजता के साथ वह अपने खुशहाल जीवन का मार्ग प्रस्थ कर सके। न ही उनके सामने ऐसे संसाधन, नजीर है, जिससे वह अपना और अपनो का जीवन समृद्ध बना सके, कारण साफ है। इन सत्ताओं के पास सिर्फ साथ, स्वार्थ सिद्धि के अलावा, विकास सेवा कल्याण का कोई स्पष्ठ न तो विजन है न ही क्रियान्वयन की प्रभावी डी.पी.आर. वरना क्या कारण है जो हमारे बच्चे नैसर्गिक प्रकृति प्रदत्त शिक्षा के मौहताज है। क्यों आज तक बच्चों को हम ऐसे प्रशिक्षित, प्रतिभावान शिक्षक नहीं दे सके जो नैतिक मूल्यों के साथ उनकी प्रतिभाओं को तरास व निखार सके।

रोजगार के बड़े-बड़े क्षेत्र व संसाधन होने के बाबजूद भी न तो हम उन्हें सफल सक्षम उत्पादक ही बना सके, न ही उन्हें खेल, संस्कृति के क्षेत्र में महारथ दिला, एक सफल, सक्षम फंकार बना सकें। क्या कारण है कि आज हर शिक्षित, कुशल, अकुशल प्रशिक्षित युवा शासकीय सेवा में ही नौकरियॉं चाहता है। क्यों, हमारे मेहनत कश बुजुर्ग आश्रमों की शोभा बढ़ाने व उन बच्चों के रहते वृद्धअवस्था में तिरस्कार का शिकार हो रहे है। जिनके लिए वह अपना समुचा सुनहरा जीवन और हाड़तोड़ मेहनत कर गाड़े पसीने से कमाई दौलत गवा दर-दर की ठोकरे खाने पर मजबूर हैं।

क्यों, वह शासकीय सेवक जो अपनी समुची जवानी ऐश्वर्य गवा, सेवा निवृत होने के बाद अपनी जमा राशि पाने उसी कार्यालय में तिरस्कार उपेक्षा का शिकार हो जाते है जिनके साथ वह सदभावना से वर्षो जनसेवा राष्ट्र सेवा में जुटे रहते हैं। यह वह यक्ष सबाल है जिन पर देश के युवा, बुजुर्गो, विद्या विद्ववानों, प्रतिभाओं को अपनी महत्वाकांक्षा, स्वयं के स्वार्थों और मोटे-मोटे पैकेज, विदेशी यात्राओं को छोड़ अवश्य विचार करना चाहिए। क्योंकि संसाधनों, सेवाओं की उपलब्धता कम और सृजन का कार्य फिलहाल अवरूद्ध है। अगर अभिभावक, पालक इन अहम मुद्दो को अब भी दरकिनार करते रहे, तो निश्चित ही सत्ता, स्वार्थ के संग्राम में डूबी सत्तायें, इनकी संस्था, संगठन, मजबूर बचपन, बेकार हाथ, और तिरस्कृत बुढ़ापे को कहां ले जाकर छोड़ेगी, समझने वाली बात है।

बेहतर हो हम धर्म, जाति, मत में न बंट, हम महान भारत के लोग एक सूत्र राष्ट्रीयता को आगे रख भव्य-दिव्य समृद्ध खुशहाल महान भारत के निर्माण विधि संवत करने में जुटें। तभी हम महान भारत स्थापित कर पायेंगे जो हमारा कर्तव्य भी है और उत्तरदायित्व भी।
जय स्वराज 
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