सत्ता उन्माद के बीच, सिसकता लोकतंत्र

व्ही.एस. भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा, 26 मई 2018। यू तो अनादिकाल से सत्ता का कर्तव्य और उत्तरदायित्व राष्ट्र, जनकल्याण सहित उसकी खुशहाली समृद्धि और सुरक्षा को लेकर रहा है। कई सत्ताधीश और समा्रट अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों के निष्ठापूर्ण निर्वहन मेें सार्थक सफल रहे तो कुछ अहम, अहंकार और निहित स्वार्थो के चलते असफल व अक्षम साबित हुए। अगर गुलामी के विभिन्न समय, काल को छोड़ दे तो भारत जैसे महान भू-भाग पर स्वर्ण अक्षरों में इतिहास भी वर्णित हुए तो कुछ इतिहास अलिखित, अकल्पित ही रह गये। 

अगर हम बात आजाद भारत की संकल्पित व्यवस्था लोकतंत्र की करें तो विगत तीन दशक से सत्ता को लेकर जो उन्माद सेवा के नाम सेवादारों के बीच पनपा है उसके चलते हम सेवा, समर्थ, कल्याण की कितनी ही बातें क्यों न करें मगर सच यह है कि हमसे हमारी समृद्धि, खुशहाली कोषों दूर जा पहुंची है। मगर जिस तरह के हालात अब सेवा और कल्याण के नाम सत्ता के लिए बन गये हैं वह सत्ता संग्राम  से आगे निकल सत्ता उन्माद में तब्दील हो रहे हैं जिसमें अब न तो जीवन मूल्यों के प्रति कोई आस्था नजर आती है न ही वह संस्कार, जिनके आधार पर एक राष्ट्र स्वयं की पहचान समृद्ध, खुशहाल और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में सक्षम, सफल साबित होता है। 

जिस तरह से सत्ता के लिए बेमेल, विचारहीन अपवित्र गठवंधनों का दौर शुरू हुआ है यह भारत जैसे महान राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते खासकर तब की स्थिति में जबकि गठवंधन करने वाले संगठन दलों के बीच सार्थक, सफल और सेवाभावी विचारों के आधार पर शक्तिसंतुलन सैद्धान्तिक रूप से स्थापित न हो। मगर सेवा कल्याण के नाम सत्ता के लिए पनपते उन्माद ने अगर यों कहे कि लोकतंत्र को शिसकने पर मजबूर कर दिया है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
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