हको के कत्लेयाम पर, हकीमों का, नासूर मरहम

व्ही.एस.भुल्ले,विलेज टाइम्स समाचार सेवा। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था या राजनीति में सेवा, कल्याण, विकास के नाम सत्तायें जिस बेरहमी से हको का कत्लेआम करती है शायद ही किसी से छिपा हो। मरहम के नाम नासूर परोसते हकीमों को शायद यह मुगालता है कि बस्ती में एक भी हुनर मद की वैध, हकीम उनके अलावा शेष नहीं। मगर बढ़ते मर्ज और नासूरों की सड़ाध बताती है कि समाज व व्यवस्था के अन्दर अगर इसी तरह मर्ज बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं तब मुंह पसारती महामारी से न तो सेवा, कल्याण, विकास में जुटे वह नीम, हकीम न ही वह दवां साज सुरक्षित रह पायेगें। जो 2 के चार कर नैतिक, अनैतिक मार्ग पर चल अपने ही संगे, संबन्धी अड़ोसी, पड़ोसी, परिचित, शुभचिन्तको, सत्ता, शासन तक पहुंचाने वाले भोले भाले लोगों का हक छीन, नाजायज तरीके से अकूत धन, ऐश्वर्य कमाना चाहते है।

कहते है कि स्वार्थ बस अनैतिक, नाजायज तरीके से की गयी सेवा, कल्याण, विकास भी पाप की ही श्रेणी में आता है। आज जिस तरह से जनता के द्वारा जनता के लिसे जनता का शासन हमारी सुन्दर लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्तित्व में है। उसे विभिन्न नामों से संगठित गैंगो ने अपनी सेवा, कल्याण, विकास से कुरुप बना दिया है। 

देखा जाये तो शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ, शुद्ध पेयजल रोजगार, मानव समाज की नैसर्गिक आवश्यकता अनादिकाल से रही है। विभिन्न राज व्यवस्थाओं में भी यह उसके अस्तित्व के मूल में रही है। और तमाम व्यवस्था, जंगल, कबीले, राजा, सम्राटों की सल्तनतो को तय करने के बाद आज जब हम जनतंत्र, लोकतंत्र में है। तब की स्थिति मेे नैतिकता से परे गुणवत्ता हीन बाजारू शिक्षा, अस्तित्व विहीन, शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा नीति अशुद्ध पेयजल और बेकार हाथ इस बात के प्रमाण है। कि हमारे नीम, हकीम, सत्तायें कौन सी सेवा कल्याण, विकास और राजधर्म का निष्ठा पूर्ण पालन में जुटी है।

लगता है कि अब सत्तायें राजकोषिय धन, बल तथा राजकोषिय धन का सेवा कल्याण, विकास के नाम नीतिगत तरीके से हासिल करने वाले सहयोगी चाटूकर चापलूसो की गैंग मात्र बनकर रह गयी है जिन्होंने स्थानीय स्तर के छोटे-मोटे रोजगारों को पलीता लगा बड़े-बड़े अघोषित माफियाओं को नीतिगत, संरक्षित संबंधित किया है। जिसके दुष्परिणाम बढ़ती बेरोजगारी, आत्महत्या और युवाओं में बढ़ती निराशा के रुप में सामने आ रही है। बड़े-बड़े मंचो और राजकोषिय धन, संपदा पर पोषित लोगों के भ्रामक प्रचार इस बात के स्पष्ट संकेत है कि नीतिगत शोषण और पोषण की खाई लगातार हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बढ़ती जा रही है। जो किसी भी सभ्य समाज, व्यवस्था के लिये सेवा, कल्याण, विकास के नाम कलंक है। जिसकी कालिख आज नहीं तो कल अवश्य साफ सुधरे वातावरण को कलंकित ही नहीं काल कल्पित भी करे तो किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। 
जय स्वराज
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