सत्ताउन्मुखी लोकतंत्र से कराहता देश

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: भारत महान में ऐसा नहीं कि इसका सूत्रपात अभी हो रहा हो। बल्कि इसकी शुरूआत तो आजादी के कुछ वर्षो बाद ही हो चुकी थी। अगर हम उपलब्ध हजारों वर्ष पूर्व के इतिहास को भी खंगाले तो काल, परिस्थिति अनुसार सत्तायें जो भी रही हो उनमें भी सत्ताउन्मुख तंत्र तो रहा ही है, मगर तब और अब की स्थिति में बड़ा अन्तर यह है कि तब की सत्तायें आदर्श सिद्धान्त, संस्कृति, पर पराओं के साथ राष्ट्र व जनकल्याणकारी होती थी तथा सत्ता के प्रति सहमति, सम्मान, असहमति और तिरस्कार ाी स्पष्ट होता था।

मगरअफसोस कि जब हम जनतंत्र लोकतंत्र का दम भरते है और हमें राष्ट्र व जन कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए तब की स्थिति में हम सतत सत्ताउन्मुखी समाज, संगठन, राष्ट्र दल बनते जा रहे जिसमें स्वार्थ और सत्ता का स्थान अब सर्वोपरि हो चला है तथा हताश, निराश, मजबूर जनमानस सत्ता प्राप्ति का माध्यम निरन्तर चुनावी श्रंखलाओं और मंहगे चुनावों के बीच, सत्ता के खेल से लगभग 70 फीसदी आबादी भले ही बाहर पढ़ी हो, मगर 10 फीसदी ऐसी सक्षम आबादी जो सत्ता ही नही, देश की संपदा, संसाधनों पर काबिज हो मानो लोकतंत्र को नया स्वरूप देने पर तुले है जो अब सफल भी होता दिखाई पड़ता है और सक्षम भी। 

जिसके अस्तित्व के रहते या और अधिक प्रभावी होने पर चर्चाओं में लोकतंत्र का सैद्धान्तिक स्वरूप तो दिखेगा मगर व्यवहारिक नही, जो हमारी और हमारे महान लोकतंत्र की सबसे बड़ी असफलता अक्षमता साबित होगी। बेहतर हो कि हम अपने समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए समृद्ध राष्ट्र निर्माण कर अपने जीवन मूल्यों की रक्षा में सार्थक सिद्ध हो, वरना भविष्य सामने है।
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