प्रतिभा दमन से, सुधार असंभव

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। ईर्षा, प्रतिस्पर्धा अगर प्रतियोगिता में है तब तो जायज कहा जा सकता है क्योंकि यह उसका स्वभाव है। मगर जब यहीं ईर्षा, प्रतिस्पर्धा स्वयं के नैतिक अनैतिक स्वार्थपूर्ति, सत्ता या सतत सत्ता हासिल करने का माध्यम बन जाये तो इसे किसी भी सभ्य समाज में नजायज ही कहा जायेगा और उसकी स्वीकार्यता कभी भी संभव नहीं हो सकती। बहुराष्ट्रीय कंपनी स्टायल में लोकतंत्र के अन्दर सत्ता नियंत्रित करने वाले शायद यह भूल जाते है कि जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाने, बजाये दूसरों की लकीर मिटाने की जगह स्वयं की लकीर लंबी खींचना आवश्यक होती है। जिसे सार्थक, सुसंस्कृत और सफल प्रयास कहा जायेगा जिसकी स्वीकार्यता समाज और व्यवस्था दोनो होती है। 

कहते है प्रतिभायें किसी की मोहताज नहीं होती, बस उन्हें तो एक अवसर की आवश्यकता होती है और उनका प्रदर्शन परिणाम भी देता है। जो किसी भी राज्य, राष्ट्र, समाज की बड़ी धरोहर होती है। आज जब इस अर्थ युग में फिल्मे, टी.व्ही. नायक, आचार्य, आध्यात्म, गुरू बन रहे है। और हमारी संस्कृति, संस्कार चारों खाने चित पड़े है, ऐसे में उन संगठन, संस्था, दल, सत्ताओं का अपने-अपने निहित स्वार्थ ऐजेन्डो की प्राप्ति के लिये अपने ही नागरिक, विद्या, विद्यावान, प्रतिभाओं का भयादोहन, भ्रम पूर्ण व्यवहार न्यायोजित नहीं कहा जा सकता। 

देखा जाये तो संगठनात्मक दलीय निष्ठा अलग बात है। मगर मानव तथा राजधर्म अलग बात है जो  हमें समय-समय पर कर्तव्य बोध कराता रहता है। मगर इसके बावजूद भी सत्तायें  झूठे आश्वासन, भाषण तथा न समझे जा सकने वाले अस्वीकार्य आंकड़े ही समृद्धि, खुशहाली का अन्तिम सच है और कर्तव्य, उत्तरदायित्वों की पराकाष्ठा तो फिर सवाल तो स्वत: ही बैमानी हो जाते है। जो ऐसी सत्ताओं के आगे निरर्थक भी होते है और दर्द पीढ़ा का माध्यम भी। 

मगर व्यवस्था की इस स्थिति को अन्तिम सच कहना स्वयं, परिवार, समाज ही नहीं इस महान राष्ट्र के साथ अन्याय होगा। अब समय आ गया कि हमारे बुजुर्ग, युवा अपने निहित स्वार्थो से निकल, कड़े संघर्ष के रास्ते, अपने पूर्वजो की कृपा, आर्शीवाद से एक ऐसी आदर्श व्यवस्था निर्माण में जुटे, जिससे हमारा ही नहीं, हमारे बच्चे, बूढ़े, युवाओं का जीवन समृद्ध, खुशहाल बन सके। अगर आज भी हम अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों में अक्षम, असफल साबित हुये तो आने समय में हमारी ही पीढ़ी दोषी करार दी जायेगी और हमारी हिस्ट्री, पतन के प्रेणेताओं के रुप में लिखी जायेगी। जो हमे शर्मनाक भी होगा और दर्दनाक भी।  

क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे माता-पिता, दादा, पूर्वजों ने तो हमें एक से बढ़कर एक आदर्श संस्कार, शिक्षा दी। मगर हम अपने बच्चों को इन नैतिक मूल्य, आदर्श, संस्कार और महान संस्कृति का ककहरा नहीं पड़ा पाये। जिसके आभाव में आज हमारे ही नहीं, अपने और आने वाली पीढ़ी की समृद्धि खुशहाली के मार्ग, कंटको से मुक्त नहीं रह पायेगेंं। तब हम एक असहाय, दया के पात्र लज्जित, मानव की स्थिति में होगें, जो हमारा इतिहास भी होगा और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिये विरासत भी।  
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