जनधन पर सत्ता उत्सव ये कैसी जनसेवा और कल्याण

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  ऐसा नहीं कि सत्ता के दुरुपयोग का मसला लोकतंत्र में कोई नया हो। इससे पूर्ववत सत्तायें भी अपनी ता...

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। ऐसा नहीं कि सत्ता के दुरुपयोग का मसला लोकतंत्र में कोई नया हो। इससे पूर्ववत सत्तायें भी अपनी ताकत का दुरुपयोग करती रही है। मगर तब सिर्फ रैलियों के नाम पर वाहनों की व्यवस्था भर सत्ताधारी दल शासकीय ताकत का उपयोग कर किया करते थे। मगर विगत 14 वर्षो से जिस तरह से नीतिगत तौर पर विभिन्न प्रकार की योजनाओं की शुरुआत के लिये आयोजित कार्यक्रम, उत्सव, पंचायत, सम्मेलन, हितग्राही, सम्मेलनों के नाम पर जनधन से जो याति बटोरने का काम सत्ताओं में शुरु हुआ है वह थमने का नाम नहीं ले रहा। 

पहले पंचायत सम्मेलन, उसके बाद विभिन्न समाज एवं विभिन्न वर्गो की भोपाल में पंचायतें कभी अटल ज्योति, भावांतर, आवास, नर्मदा परिक्रमा, आदि शंकराचार्य यात्रा, उज्जवला, सौभाग्य योजना तो अब तेन्दु पत्ता वितरण, पानी बोतल, चरणपादुका वितरण जैसे उत्सवों का आयोजन जिन पर बेरहमी से करोड़ों रुपये का खर्च जो विभिन्न योजनाओं और विभागों के मदों से किया जाता है। वह उचित नहीं। 

देखा जाये तो किसी भी व्यवस्था में राजकोष का उपयोग राज्य व जनकल्याण के क्षेत्र में सुनिश्चित होना सत्ता का कर्तव्य ही नहीं, उसका उत्तरदायित्व भी है। ऐसा नहीं कि ऐश्वर्य और याति प्राप्त करने अन्य कोई योजना न रही हो। मगर जनधन की बर्बादी कर ऐश्वर्य और याति बटौरने के उत्सव तब की स्थिति में औचितहीन और जनधन विरोधी बन जाते है। जबकि राज्य भर में रोजगार के लिये बेरोजगार दर-दर की ठोकरे खाते हो और अनुबंधित आधारित अल्प रोजगार प्राप्त युवा कत्र्तव्य निर्वहन के बजाये सड़कों पर मोर्चा निकाल धरने प्रदर्शन के रास्ते अपनाते हो। 

साथ ही प्रदेश का अन्नदाता हक मांगने आग उगलती संगीनों का शिकार हो अपने उत्पादन का उचित मूल्य पानी आ समय ही अकाल का शिकार हो जाते हो। शुद्ध पेयजल तो दूर प्राकृतिक पेयजल स्त्रोतो पेयजल प्राप्त करने तरस जाते हो। 

देश-विदेश में याति ऐश्वर्य एवं सतत सत्ता में बने रहने ढोकर लाये जाने वाले अनुबंधित अल्प रोजगार प्राप्त संविदा कर्मी, विभिन्न योजनाओं के हितग्राही और ग्रामीणों का जमघट सत्तायी मशीनरी से इकट्टा कर चित्र चलचित्रों में तो स्वयं की लोकप्रियता और मजबूर आम जन की बैवसी पर ऐश्वर्य और याति की नुमाइस लगाई जा सकती है। हो सकता है वोटों के आंकड़ोंं की इन्जीनियरिंग राज्य के करोड़ोंं भोले-भाले मजबूर, बैवस नागरिक न समझ सके और फिर से सत्ताओं के लिये सत्ता का मार्ग प्रस्त कर दें, मगर इस तरह की सत्ताउन्मुख व्यवस्था न तो वर्तमान पीढ़ी के हित में न ही भविष्य की पीढ़ी के हित में है। 

शायद सत्ता के मद में चूर अहंकारी उन सत्ता, संगठनों, दलों को यह मुगालता है कि उनसे बड़ा धर्म धीरु, राष्ट्र भक्त, सच्चा जनसेवक इस भू-भाग पर कोई दूसरा नहीं। तो यह ऐसी सत्ता, संगठन, दलों के लिये इस तरह की जनधन की बर्बादी आज नहीं तो कल अभिसप्त रुप में सामने होगी। क्योंकि कहते है सृष्टि के विरुद्ध जिसने भी जब-जब सत्ता के मद में चूर प्रकृति से संघर्ष छेड़ा है उसके अभिसप्त परिणाम उसे अवश्य भोगना पड़े है। 

बेहतर हो कि हम सृष्टि के सर्वोत्तम सृजन के रुप में अपनी उपादेयता साबित कर, स्वयं को सार्थक सफल सिद्ध करें। बरना महान पवित्र ग्रन्थ, गीता, भागवत में उल्लेखित कई अंश इस बात के प्रमाण है कि सत्य क्या है और जीवन सृजन का माध्यम क्या हो। 
जय स्वराज

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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जनधन पर सत्ता उत्सव ये कैसी जनसेवा और कल्याण
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