प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध व्यवहार, खुशहाल जीवन में बड़ी बाधा,स्वराज से संभव है खुशहाली, देश के लिए युवा, बुजुर्ग ही नही विधा, विद्वानों को दिखाना होगा पुरूषार्थ

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार: वर्षो के कड़े संघर्ष, त्याग, तपस्या और अनगिनत कुर्वानियों से प्राप्त आजादी वर्तमान हालातों में निरर्थक साबित हो रही है। देखा जाए तो देश या प्रदेशों में मांगने और बांटने का जो खेल कर्तव्य निर्वहन का कार्य, उत्तरदायित्वों से पूर्व जो शुरू हुआ है वह प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध ही नहीं स्वराज के मार्ग में बड़ी बाधा है। अब विचार अपने-अपने सपने साकार करने और विरासत में आने वाली पीढिय़ों को ऐसे मार्ग छोडऩे पर देश के युवा, बुजुर्ग विधा, विद्वानों को करना है। जिनके स्पर्शी, पारदर्शी परिणाम मूलक निर्णय इस महान राष्ट्र को समृद्ध और जनजीवन को खुशहाल बना सके और यह तभी संभव है जब हम सभी व्यक्ति से व्यक्ति, व्यक्तियों से परिवार और परिवार से समाज तथा राष्ट्र के लिए निस्वार्थ भाव से अपने-अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सके और यह महान कार्य महान भारत वर्ष में संभव है। 

क्योंकि भारत वर्ष जैसे महान भू-भाग के लिए असंभव जैसी न तो कभी कोई विषय वस्तु रही है और न ही त्याग तपस्या की पराकाष्ठा आज भी भारत वर्ष का हर बुजुर्ग, नौजवान वह सब कुछ कर सकता है जो भारत ही नहीं उनके अपने व अपनों के सपनों को साकार कर सके। जरूरत आज इस महान भारत को उन महान नागरिकों की है जिनमें स्वयं के लिए ही नहीं अपने परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए  कुछ कर गुजरने का पुरूषार्थ एवं प्राकृतिक न्याय संगत कर्तव्य निर्वहन की लालसा हो यह कार्य न तो हमारी पहचान से दूर है और न ही हमारी महान संस्कृति और विरासत से। 

अब करना हमें सिर्फ यह है कि अपने महान संविधान और संस्कृति की छत्र-छाया और अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से उस समृद्ध, खुशहाल भारत का निर्माण करना जो हमारा कर्तव्य भी है और उत्तरदायित्व भी। और जो स्वराज के रास्ते ही संभव है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम भारतवंशियों की अपनी एक स्वाभीमानी पहचान है और हमें किसी भी कीमत पर उसे नहीं खोना चाहिए। जिसका आभास प्राकृतिक न्याय सिद्धान्त से तो होता ही है साथ ही हमें संतुलन का सिद्धान्त भी संरक्षित करता है। 

जरूरत आज हमें हमारे संरक्षक व देश के विधा, विद्वानों के मार्गदर्शन में, हमें राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में न्याय के सिद्धान्त का पालन करने की, अगर हम महान भारत वर्ष के लोग, आपसी समन्यवय और सूजबूझ के साथ, स्वयं के साथ न्याय कर पाए तो यह हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि और आने वाली पीड़ी के लिए हमारी विरासत होगी। जो हमारे खुशहाल जीवन का मार्गप्रस्थ कर हमें उसका एहसास भी करायेगी और अनुभूति भी और तब हम सफल भी कहे जायेंगे और सक्षम भी। जिसमें सभी का योगदान अपेक्षित होकर परिणाम मूलक हो, शायद हमारी सत्तायें भी विधि संबद्ध देश के महान संविधान की भावना अनुरूप अपने योगदान से देश के युवा, बुजुर्ग, विधा, विद्वानों के सहयोग से खुशहाली का मार्ग प्रस्थ करने में अपनी भूमिका सुनश्चित कर सकें  और इस सत्य को समझ सकें कि समृद्धि, खुशहाली और युवा, बुजुर्गों के सपने सिर्फ मात्र ढांचागत व्यवस्थाओं से ही पूर्ण नहीं हो सकते, उसके लिए सभी का सहयोग और विधा, विद्ववान प्रतिभाओं का संरक्षण अहम है और प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त जन-जीवन के लिए सर्वोपरि है। यही हमारा मान, सम्मान और स्वाभीमान और हमारी पहचान को सुनिश्चत कर हमें समृद्धि, खुशहाली की ओर ले जाकर हमारी प्रतिभाओं को समान अवसर दिला सकता है। 
जय स्वराज।

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