सर्वोच्च सत्ता से सत्ताओं का संघर्ष विनाश के संकेत

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। प्राकृतिक सिद्धान्तों के पालन की बाध्यता इस पृथ्वी पर अनादिकाल से सभी को रही है फिर वह जीव, जगत, मानव, सत्ता, सम्राट, साम्राज्य, शासन साधारण रहे हो या असाधारण, पृथ्वी पर स्थापित साधारण या आसाधारण जिस भी व्यक्ति, जीव जगत, सत्ताओं ने प्रकृति न्याय, सन्तुलन के न्यायिक सिद्धान्तों का पालन नहीं किया। वह या तो अपने अस्तित्व ही खो चुकी है या खोने के कगार पर रही है और है। क्योंकि इस ब्रह्माण्ड में प्रकृति ही वह सर्वोच्च सत्ता है जिसके न्यायिक सिद्धान्त का अनुशरण कर जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाया जा सकता है।

क्योंकि प्रकृति में मौजूद ऊर्जा का उपयोग सृजन और उसका व्यवस्थापन ही जीवन चक्र है। जिसका आभास हमारे पुराण, वेद, ग्रन्थो, से होता है और इतिहास हमें इस बात का एहसास भी कराता है कि हमसे पूर्व प्राकृतिक सिद्धान्तों जीवन मूल्यों की रक्षा, सरंक्षण, पालन या बहिष्कार कर उपेक्षा करने वाले जीव, जगत, मानव, सत्ताओं का क्या हर्ष, परिणाम रहा। लोग इस अर्थ और आधुनिक युग में भूत या अपने अतीत को भुला सकते है। वर्तमान की कीमत पर भविष्य को अस्वीकार सकते है मगर समय और सच को नहीं झुठला सकते। क्योंकि वह उनके आधीन नहीं, फिर वह कितना ही साधारण, असाधारण जीव, मानव, सत्तायें, शासन, सम्राट, सत्ता प्रमुख हो।

जिस भी व्यवस्था में अराजकता संदेह, अविश्वास पूर्व माहौल हो और लोगोंं में अपने सकुशल, सुरक्षित जीवन, सृजन समृद्धि और खुशहाली को लेकर असुरक्षा का भाव हो, ऐसे में समझने वाली बात यह है कि प्राकृतिक न्याय व्यवस्था से दूर सिद्धान्तो का पालन नहीं हो रहा है। क्योंकि यह सर्व विधित और प्रमाणिक है कि ऊर्जा का उपयोग के बाद उसे अधिक समय तक संग्रहित नहीं रखा जा सकता। क्योंकि ऊर्जा सृजन की सूत्रधार है। अगर उसकी प्रकृति विरूद्ध उसे रोका जाये तो वह सृजन करने वाली ऊर्जा ही विनाश का कारण बन जाती है। फिर वह ऊर्जा का अंश किसी जीव, जगत, मानव, प्रकृति में हो या फिर किसी शासक, सम्राट, सत्ताओं में आखिर उसे प्रकृति अनुसार, उपयोग के बाद व्यवस्थापन तो चाहिए ही।

मगर दुर्भाग्य कि आज बहुत उलट हो रहा है। फिर वह प्रकृति के साथ हो या जीव-जगत, मानव, राजा, सम्राट सत्ताओं, शासको के साथ। जिसके विनाशक लक्षण आये दिन हमारे सामने होते है। जिसे न तो हम समझना चाहते न ही समझाना। छणिक सत्ता प्राप्त कर अहंकार के मद में डूब हम आज भी समय और सत्य को पहचानना नहीं चाहते और अज्ञानता बस अपने स्वार्थी स्वभाव को शान्त करने उस सर्वोच्च शक्ति से संघर्ष में जुट जाते है जो अजय है। जिसको पराजय या प्रभावित करने की क्षमता न तो भूत में किसी के पास रही है, न ही वर्तमान में होगी, न ही भविष्य में। फिर किरदार कोई कैसा भी अदा कर ले, या पूर्व में अदा किया हो, कुछ को छोड़ दे तो सफलता कम ही प्राणियों को हासिल हुई। क्योंकि सत्ताओं का अस्तित्व सर्वकल्याण में निहित होता है, स्व:हित में नही, यही सत्य है। 
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