संतो को परिभाषित करती सियासी सत्तायें

व्ही.एस.भुल्ले:  जिस तरह से संतों के नाम सत्तायें अपने-अपने सियासी लाभ के लिये नई-नई परिभाषायें गढऩे में जुटी है कम से कम ऐसी सत्ता और स...

व्ही.एस.भुल्ले: जिस तरह से संतों के नाम सत्तायें अपने-अपने सियासी लाभ के लिये नई-नई परिभाषायें गढऩे में जुटी है कम से कम ऐसी सत्ता और सियासी दलों को इन चार पंतियों का अवश्य संज्ञान लेना चाहिए। जो कभी न कभी किसी न किसी संत या श्रेष्ठ व्यक्तित्व ने अपनी पंतियों में परिभाषित करने की कोशिश की है। अगर यो कहे कि यह पंक्तियां संत, संगत का यथार्थ है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। 

ट्टउदर समाता मांग ले, तन समाता चीर
ज्यादा संग्रह न करें, ताको नाम फकीर
फिक्र सबन को लागत है, फिकर सबन की पीर
फिकर का फांका जो करे, ताको नाम फकीर**  

वैसे भी अनादिकाल से संत, रिषिमुनि, फकीरों की सत्तायें राजसी सत्ताओं से सर्वोपरि रही है और उन्होंने समय-समय पर समाज ही नहीं, सत्ताओंं तक मार्गदर्शन अपनी स्वयं की त्याग-तपस्या के बल निस्वार्थ भाव से किया है। जिसे भारतीय संस्कृति में न तो छिपाया जा सकता है और न ही झुठ लाया जा सकता है। पुरांण, वैध, निषध-उपनिषध शास्त्रों से लेकर इतिहास तक भरे पड़े है। कि संत संगत जीव कल्याण की मार्गदर्शक ही नहीं, संरक्षक रही है। जिसने कई सत्ता, परिषदों, राजा-महाराजा सहित समाजों का मार्गदर्शन कर, खुशहाल, समृद्ध जीवन के लिये मार्गदर्शित किया है। फिर समय काल परिस्थिति जो भी रही हो। 

उन्होंने हमेशा से निस्वार्थ भाव से प्रकृति में मौजूद हर जीव-जन्तु, मानव, कल्याण के कत्र्तव्य का निर्वहन किया है। कहते है कि जब व्यक्ति बैराग्य को प्राप्त कर लेता है तो वह स्वत: ही संत बन जाता है। और बैराग्य प्राप्त वह तब कर पाता है जब वह माया मोह त्याग बैरागी बन, परं पिता परमात्मा अर्थात अदृश्य महाशक्ति की शरण में जाने तैयार हो जाता है। तब उसे संतत्व ही प्राप्ति होती है। मगर कहते है कि यह कल युग है और इसमें स्वयं-भू सत्तायें या शक्तियां वहीं गलतियां सत्ता के लिये दोहराने मजबूर है। जो अनादिकाल से अक्ष य, अप्रभावी और कभी न सफल होने वाली असफल होती रही है। 

बहरहाल सत्ताओं का समय काल परिस्थिति अनुसार अपनी-अपनी परिभाषायें, परिणाम रहे है। मगर जो परिभाषायें फिलहाल गढऩे की कोशिश भारतवर्ष जैसे महान भू-भाग पर सत्ता स्वार्थो के लिये अभी तक होती रही या हो रही है वह सुखद नहीं कही जा सकती है। क्योंकि इतिहास गवाह है और सत्ताओं का नया इतिहास गढऩे तैयार। 

ऐसे में समझने वाली बात यह है कि जो समाज, राष्ट्र सत्ताओं के स्वयं मार्गदर्शक और नि:स्वार्थ भाव से जन जीव कल्याण के लिये पीढ़ी दर पीढ़ी त्याग-तपस्या में जुटे रहे वह किसी सत्ता के अधीन स्वयं के संतत्व को कैसे सुरक्षित और परिभाषित कर सकेगें। यह यक्ष सवाल समाज और राष्ट्र के लिये हमेशा बना रहेगा और भ्रमित भी करता रहेगा। जैसा कि म.प्र. में सत्ता के अधीन राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है। यह समुचे संत जगत का मान-स मान है या अपमान यह तो स्वयं संत संगत को तय करना होगा।

काश सत्तायें संतो से मार्गदर्शन लेने उन्हें राज अतिथि या मार्गदर्शक की भूमिका में देखती तो यह म.प्र. ही नहीं, समुचे समाज के लिये मान-स मान और स्वाभिमान की बात होती है। सच, झूठ जो भी हो फिलहाल इस निर्णय को न तो सुखद और न ही परिणाम मूलक और न ही बेहतर समझ पूर्ण निर्णय ठहराया जा सकता। 
जय स्वराज 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: संतो को परिभाषित करती सियासी सत्तायें
संतो को परिभाषित करती सियासी सत्तायें
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