गांधी-कॉग्रेस, कुर्बानियों की मिशाल, निष्ठा पर संदेह बैमानी

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। राजनैतिक द्वेष के चलते आज कल जिस तरह के सवाल गांधी नाम या कॉग्र्रेस को लेकर उछाले जा रहे है। वह गांधी नाम और कॉग्रेस की राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर संदेह ही नहीं गांधी और कॉग्रेस नाम के साथ बैमानी और अन्याय है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि गांधी और कॉग्रेस भारत वर्ष के लिये कुर्बानियों की मिशाल है। अनगिनत कॉग्रेसी नेताओं ने राष्ट्र के लिये आजादी से पूर्व और आजादी बाद कुर्बानियां दी है, जो किसी से छिपी नहीं, जिसे देश भी नहीं भुला सकता और न ही इस देश को भूलना चाहिए। 

देखा जाये तो देश की आजादी के बाद या पूर्व में हुई अनगिनत कुर्बानियों को, इस देश को याद ही नहीं, भूलना भी नहीं चाहिए जो हमारी पहचान ही नहीं, हमारा मान-सम्मान भी रही है, जो हर भारतवासी की पहचान है जिसका इतिहास कुर्बानियों से भरा पड़ा है। फिर फैहरिस्त कितनी ही ल बी क्यों न हो। महात्मा गांधी, सुभाष बाबू से लेकर, पं. नेहरु, शास्त्री, इन्दिरा, राजीव गांधी, बैयन्त सिंह तक सेकड़ों नेताओं, कार्यकर्ताओं की कुर्बानियां कॉग्रेस और गांधी नाम के योगदान के रुप में भरी पड़ी है। कुछ के नाम आज हम जानते है तो कुछ आज भी चर्चाओं के बीच मौजूद नहीं।  फिर समय काल परिस्थिति अनुसार स्थिति जो भी रही हो। कहते है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और किसी भी व्यक्ति, दल, संगठन में  उतार-चढ़ाव नियति के हाथ। अगर कॉग्रेस आज विरोधी, दलों या संगठनों, संस्थाओं, व्यक्तियों के बीच उपहास का कारण है, तो इसमें दोष न तो गांधी, कॉग्रेस नाम का है और न ही नये नवेले कॉग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का। ये अलग बात है कि उन्होंने दिल्ली के कॉग्रेस अधिवेशन में कार्यकर्ताओं के अन्दर जान फूकने बतौर कॉग्रेस नेता जो भी कहा हो। 

मगर उन्होंने कुछ बातों से देश ही नहीं, कॉग्रेस को भी यह स्पष्ट संदेश अवश्य दिया है कि वह कॉग्रेस को मजबूती और  कॉग्रेस में कार्यकर्ताओं का मान कायम करने जीवन पर्यन्त तक पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करेगें और कार्यकर्ताओं का जो मान-सम्मान किसी भी दल में होना चाहिए उससे कहीं आगे जाकर वह कार्यकत्र्ताओं के हक के लिये आगे बढ़ेगें। इससे स्पष्ट है  कि गांधी कॉग्रेस नाम ही नही अब राहुल की निष्ठा पर संदेह करना भी सिर्फ और सिर्फ बैमानी है। जिस तरह से दबे पैर उन्होंने कॉग्रेस के अन्दर सफाई अभियान चला रखा है, अगर वह अभियान इसी तरह निरन्तर जारी रहा तो कोई कारण नहीं जो देश में एक मर्तवा फिर से गांधी और कॉग्रेस नाम की वहीं प्रतिष्ठा कायम हो सके, जिसकी वह हकदार है। 

मगर राहुल को कॉग्रेस मेें सिर्फ खरपतबार उखाडऩे तक ही सीमित नहीं रहना होगा बल्कि इससे चार कदम आगे जाकर कॉग्रेस मानसिकता से ओत-प्रोत ऐसे राष्ट्रवादी संगठन, संस्थाओं को साथ लेकर सहयोगियों की नई फसल उगा ऐसे पौधों को भी सस मान सिंचित करना होगा जो कॉग्रेस विचार के इर्द-गिर्द अपने विचारों के माध्यम से राष्ट्र सेवा करना चाहते है। और ऐसे कार्यकर्ताओं, नेताओं की फसल भी उगानी होगी जो कॉग्रेस विचारों को आगे बढ़ा सके। मगर यह तभी संभव है जब इन कार्यो की पहल स्वयं राहुल गांधी करे। देखा जाये तो देश की राजनीति में जिस तेजी से राजनैतिक संस्कृति बदल रही है और गांधी कॉग्रेस नाम को लेकर जिस तरह से विरोधी दल संस्था, व्यक्ति इन नामों की प्रतिष्ठा को लेकर हमलावर है अगर  राजनैतिक हमलें इसी तरह बगैर किसी जमीनी प्रतिवाद के चलते रहे, तो निश्चित ही, आने वाले समय में राजनैतिक संस्कृति ही नहीं, इतिहास भी बदल जाये, तो भारतीय राजनीति में कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 
जय स्वराज 
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